उदितः परस्य क्त्व इड् वा।
शमित्वा, शान्त्वा। देवित्वा, द्यूत्वा। दधातेर्हिः, हित्वा।
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८८२- उदितो वा। उत् इत् यस्य स उदित्, तस्मात्। उदितः पञ्चम्यन्तं, वा अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। जृव्रश्च्योः वित्व से विभक्तिविपरिणाम करके क्त्वः और वसतिक्षुधोरिट् से इट् की अनुवृत्ति आती है।
ह्रस्व उकार की इत्संज्ञा हुई हो ऐसी उदित् धातु से परे क्त्वा को विकल्प से इट् का आगम होता है।
शमित्वा, शान्त्वा। शान्त होकर। शमु उपशमे। शम् धातु से समानकर्तृकयोः पूर्वकाले से क्त्वा, अनुबन्धलोप, आर्धधातुकसंज्ञा, नित्य से इट् प्राप्त, उदित् होने के कारण उसे बाधकर के उदितो वा से विकल्प से इट् का आगम करके शम्+इत्वा, वर्णसम्मेलन होकर शमित्वा बन जाता है। इट् न होने के पक्ष में शम्+त्वा है। अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति से उपधा को दीर्घ और मकार को अनुस्वार, उसको परसवर्ण होकर शान्त्वा बनता है। दोनों रूपों की क्त्वाप्रत्ययान्त होने के कारण अव्ययसंज्ञा होती है, प्रातिपदिकत्वेन आई विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् होकर शमित्वा, शान्त्वा ये दो रूप सिद्ध हो जाते हैं।
देवित्वा, द्यूत्वा। जूआ खेल कर। दिवु क्रीडाविजिगीषा०। दिव् धातु से समानकर्तृकयोः पूर्वकाले से क्त्वा, अनुबन्धलोप, आर्धधातुकसंज्ञा, नित्य से इट् प्राप्त, उदित् होने से उसे बाधकर के उदितो वा से विकल्प से इट् का आगम करके दिव्+इत्वा, वर्णसम्मेलन होकर देवित्वा बन जाता है। इट् न होने के पक्ष में दिव्+त्वा बना है।
च्छ्वोः शूडनुनासिके च से वकार के स्थान पर ऊठ् आदेश दि+ऊ+त्वा बना। यण् करके द्यूत्वा बन गया। दोनों की क्त्वाप्रत्ययान्त होने के कारण अव्ययसंज्ञा होती है, प्रातिपदिकत्वेन आई विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् होकर देवित्वा, द्यूत्वा ये दो रूप सिद्ध हो जाते हैं।
हित्वा। धारण करके। डुधाञ् धारणपोषणयोः। अनिट् धा धातु से क्त्वा करके धा+त्वा बना। दधातेर्हिः से धा के स्थान पर हि आदेश करके हित्वा बना। अव्ययसंज्ञा, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुलुक् आदि तो पूर्ववत् है ही।