समानकर्तृकयोर्धात्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानाद्धातोः क्त्वा स्यात्।
भुक्त्वा व्रजति। द्वित्वमतन्त्रम्। भुक्त्वा पीत्वा व्रजति।
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८७९- समानकर्तृकयोः पूर्वकाले। समानः कर्ता ययोस्तौ समानकर्तृकौ, तयोः समानकर्तृकयोः, पूर्वश्चासौ कालः पूर्वकालः, तस्मिन् पूर्वकाले। समानकर्तृकयोः षष्ठ्यन्तं, पूर्वकाले सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा से क्त्वा की अनुवृत्ति आती है और धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।
समानकर्तृक धात्वर्थों में पूर्वकाल में विद्यमान धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है।
जहाँ दो या दो से अधिक धातु हों और उन धातुओं का कर्ता एक ही तो वहाँ एक धातु की क्रिया सबसे पहले होगी, उसके बाद दूसरी क्रिया होगी, उसके बाद तीसरी क्रिया होगी और अन्त में मुख्यक्रिया होगी। यह सूत्र समानकर्तृक धातुओं में पूर्वकालिक क्रिया वाले धातु से क्त्वा प्रत्यय का विधान करता है। ककार इत्संज्ञक है, त्वा बचता है। इसका अर्थ जैसे- कृत्वा=करके, भुक्त्वा=खाकर, भूत्वा=होकर आदि समझें। क्त्वा प्रत्यय होने के बाद क्त्वातोसुन्कसुनः से अव्ययसंज्ञा हो जाती है।
भुक्त्वा व्रजति। राम खाकर के जाता है। यहाँ भुज् और व्रज् दो धातु हैं। खाने
का काम भी राम कर रहा है और जाने का काम भी राम ही कर रहा है, दोनों धातुओं का कर्ता एक राम ही है किन्तु यहाँ खाने का कार्य पहले और जाने का कार्य बाद में है। इसलिए पूर्वकालिक क्रिया है खाना। अतः भुज् धातु से क्त्वा प्रत्यय हुआ। ककार की इत्संज्ञा हुई, त्वा बचा। भुज्+त्वा बना। चोः कुः से भुज् के जकार को कुत्व, भुग्+त्वा, गकार को खरि च से चर्त्व होकर ककार हुआ, भुक्त्वा बना। अव्यय होने के कारण सु का अव्ययादाप्सुपः से लुक् हुआ। भुक्त्वा व्रजति।
द्वित्वमतन्त्रम्। सूत्र में द्वित्व संख्या विवक्षित नहीं है अर्थात् क्त्वा प्रत्यय करने के लिए केवल दो ही क्रियायें हों, ऐसी बात नहीं है, अपितु दो या दो से अधिक अनेक क्रियाएँ हों तो भी उनमें से पूर्वकालिक क्रियाओं में क्त्वा प्रत्यय होता है। इसलिए भुक्त्वा पीत्वा व्रजति में भुज् और पा दोनों धातुओं से क्त्वा हुआ। तात्पर्य यह है कि यहाँ समानकर्तृकयोः ऐसा द्विवचनान्त पद द्वि धातु के लिए प्रधान नहीं है अपितु दो या दो से अधिक इस अर्थ को बताने के लिए मानना चाहिए। जितनी भी पूर्वकालिक क्रियायें होंगी, उन सब से क्त्वा होने के बाद यदि धातु सेट् हो तो इट् आदि होकर प्रातिपदिकसंज्ञा करके और अनिट् हो तो इट् के विना विभक्ति को लाकर एवं उसका लोप करके क्वान्त रूप सिद्ध होते हैं। भुक्त्वा पीत्वा व्रजति।
प्रेरणा आदि अर्थ में णिच् होने के बाद ण्यन्त धातु अथवा चुरादि के ण्यन्त धातुओं से भी क्त्वा प्रत्यय होकर रूप बनते हैं। जैसे- कृ से णिच् होने पर कारि बना है, उससे क्त्वा होने पर कारि+त्वा बना। इट् का आगम होकर कारि+इत्वा बना। इकार को गुण और अय् आदेश होकर कार्+अय्+इत्वा बना। वर्णसम्मेलन होकर कारयित्वा बन जाता है। इसी तरह धारयित्वा, चोरयित्वा, पाययित्वा, खादयित्वा, पाठयित्वा आदि बनाये जा सकते हैं। समास आदि हो जाने के बाद तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश होने के बाद ल्यप् का यकार वल् में नहीं आता, अतः वलादिलक्षण इट् का आगम नहीं होता। फलतः अनिडादि आर्धधातुक को परे मानकर णेरनिटि से णिच् के इकार का लोप हो जाता है, जिससे अवधार्य, प्रधार्य, प्रचोर्य, प्रखाद्य, प्रपाय आदि रूप बनाये जा सकते हैं।