Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 880
कितोऽकिद्विधायकमतिदेशसूत्रम्
न क्त्वा सेट्
Aṣṭādhyāyī 1.2.18
Vṛtti Varadarājācārya

सेट् क्त्वा किन्न स्यात्। शयित्वा। सेट् किम्? कृत्वा।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८८०- न क्त्वा सेट्। इटा सह वर्तत इति सेट्। न अव्ययपदं, क्त्वा लुप्तप्रथमाकं, सेट् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। असंयोगाल्लिट् कित् से कित् की अनुवृत्ति आती है।

इट् से युक्त क्त्वा को कित् न हो।

क्त्वा में ककार की इत्संज्ञा होने के कारण स्वतः कित् है। विद्यमान कित् को ही यह सूत्र अकित् मानने का अतिदेश करता है। अकित् होने से गुण का निषेध नहीं होगा, यही फल है।

शयित्वा। सोकर के। शीङ् स्वप्ने। शी धातु यदि पूर्ववर्ती क्रिया में आ जाय तो उससे भी समानकर्तृकयोः पूर्वकाले से क्त्वा होगा ही। वलादिलक्षण इट् आगम करके

शी+इत्वा बना है। ऐसी अवस्था में कित् त्वा को न क्त्वा सेट् से अकिद्धद्राव कर देने से शी के ईकार का विडंति च से गुण का निषेध नहीं हो पाता है। फलतः गुण होकर शे+इत्वा, अयादेश होकर शयित्वा सिद्ध हो जाता है।

सेट् किम्? कृत्वा। यदि न क्त्वा सेट् में सेट् नहीं कहते तो अनिट् कृ आदि धातुओं से भी परे क्त्वा को अकित् हो जाता, जिससे गुण आदि होकर अकर्त्वा ऐसा अनिष्ट रूप बनने लगता।