Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 878
क्वाप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अलङ्खल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा
Aṣṭādhyāyī 3.4.18
Vṛtti Varadarājācārya

प्रतिषेधार्थयोरलङ्कुल्वोरुपपदयोः क्त्वा स्यात्। प्राचां ग्रहणं पूजार्थम्।

अमैवाव्ययेनेति नियमान्नोपपदसमासः। दो दद् घोः। अलं दत्त्वा।

घुमास्थेतीत्वम्। पीत्वा खलु। अलङ्कुल्वोः किम्? मा कार्यात्।

प्रतिषेधयोः किम्? अलङ्कारः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८७८- अलङ्कुल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा। अलं च खलुश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः अलङ्कुल्, तयोः। अलङ्कुल्वोः सप्तम्यन्तं, प्रतिषेधयोः सप्तम्यन्तं, प्राचां षष्ठ्यन्तं, क्त्वा लुप्तप्रथमान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

निषेध अर्थ में विद्यमान अलं और खलु शब्दों के उपपद होने पर धातुओं से क्त्वा प्रत्यय होता है।

क्त्वा में ककार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा होती है, त्वा शेष रहता है। अलङ्कुल्वोः यह सप्तम्यन्त है। इससे उपपद का निर्देश है। अतः अलं दत्त्वा और पीत्वा खलु में उपपद समास का किया जाना चाहिए था किन्तु अमैवाव्ययेन अर्थात् अम्( णमुल्) के साथ ही जिस उपपद का तुल्य विधान हो वह उपपद ही अव्यय के साथ समास को प्राप्त होता है, अन्य नहीं। इस नियम सूत्र के अनुसार यहाँ पर उपपदसमास नहीं होगा।

इस सूत्र में प्राचाम् यह पद विकल्प के लिए नहीं है अपितु प्राचीन आचार्यों के सम्मान के लिए है। धन्य हैं वे प्राचीन आचार्य, जिनका स्मरण पाणिनि जी अपने सूत्रों में करते हैं, विना किसी अन्य प्रयोजन के।

क्त्वा प्रत्ययान्त शब्द क्त्वातोसुन्कसुनः से अव्ययसंज्ञक हो जाता है, जिससे आई हुई विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लोप होता है।

अलं दत्त्वा। मत दो। यहाँ पर अलं पूर्वक दा धातु है। निषेध अर्थ में विद्यमान अलं के योग में अलङ्कुल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा से क्त्वा प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके दा+त्वा बना। दो दद्योः से दा के स्थान पर दद् आदेश होकर दकार को चर्त्व करके दत्+त्वा, वर्णसम्मेलन करके दत्त्वा बना। क्त्वाप्रत्ययान्त होने से अव्ययसंज्ञा होती है, अतः सु का अव्ययादाप्सुपः से लुक् होकर दत्त्वा सिद्ध हुआ। अलं दत्त्वा। अमैवाव्ययेन के नियमानुसार अलम् के उपपद रहते हुए भी दत्त्वा के साथ उपपद समास नहीं होता।

पीत्त्वा खलु। मत पीओ। यहाँ पर खलु उपपद वाला पा धातु है। निषेध अर्थ में विद्यमान खलु के योग में अलङ्कुल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा से क्त्वा प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके पा+त्वा बना। घुमास्थागापाजहातिसां हलि से पा के आकार के स्थान पर ईकार आदेश होकर पी+त्वा बना। क्त्वाप्रत्ययान्त होने से अव्ययसंज्ञा होती है, अतः सु का अव्ययादाप्सुपः से लुक् होकर पीत्वा सिद्ध हुआ। पीत्वा खलु। यहाँ पर भी अमैवाव्ययेन के नियमार्थ होने से उपपद समास नहीं होता।

अलङ्कुल्वोः किम्? मा कार्षीत्। यदि अलङ्कुल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा इस सूत्र में अलङ्कुल्वोः न पढ़ते तो मा कार्षीत् इस निषेधात्मक मा के योग में भी कार्षीत् की जगह क्त्वा होकर अनिष्ट रूप बनने लगता। एतदर्थ अलङ्कुल्वोः का पाठ किया गया। कार्षीत् यह पद मा के उपपद होने पर कृ धातु के लुङ् अट् का अभाव होकर बना है।

प्रतिषेधयोः किम्? अलङ्कारः। यदि अलङ्कुल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा इस सूत्र में प्रतिषेधयोः (निषेधार्थक) न पढ़ते तो अलङ्कारः में अलं के योग में कृ धातु से क्त्वा होकर अलङ्कृत्वा ऐसा अनिष्ट रूप बनने लगता। अतः इसके निवारण के लिए प्रतिषेधयोः पढ़ा गया।