Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 877
आतो युच्
Aṣṭādhyāyī 3.3.128
Vṛtti Varadarājācārya

खलोऽपवादः। ईषत्पानः सोमो भवता। दुष्पानः। सुपानः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८७७- आतो युच्। आतः पञ्चम्यन्तं, युच् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। ईषद्दुस्सुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् से ईषद्दुस्सुषुः और कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

दुःख और सुख अर्थ वाले ईषत्, दुस्, सु उपपद होने पर आकारान्त धातु से युच् प्रत्यय होता है।

यह सूत्र ईषददुस्सुषुः कृच्छ्रकृच्छ्रार्थेषु खल् का अपवाद है। युच् में चकार की इत्संज्ञा होती है, यु शेष बचता है। उसके स्थान पर युवोरनाकौ से अन आदेश होता है। यह भी खलर्थ प्रत्यय है। अतः तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः के अनुसार भाव और कर्म अर्थ में ही होता है।

ईषत्पानः सोमो भवता। दुष्पानः। सुपानः। कृच्छ्र अर्थात् कष्ट अर्थ में दुस् पूर्वक पा धातु और अकृच्छ्र अर्थात् सुख अर्थ में सु और ईषत् पूर्वक पा धातु यहाँ पर है। दुःखेन पीयत इति दुष्पानः अर्थात् जो कष्ट से पान कर सके और सुखेन पीयते इति सुपानः अर्थात् जो आसानी से पान किया जा सके। सुखार्थ में ही ईषत् का भी प्रयोग है। अतः ईषत्पानः भी बनता है। यहाँ पर दुस्, ईषत् और सु उपपद में हैं और पा पाने धातु है। आतो युच् से खल् के अर्थ में युच् प्रत्यय करके अनुबन्धलोप होने पर यु के स्थान पर युवोरनाकौ से अन आदेश करके दुष्पान, ईषत्पान, सुपान बनते हैं। इनकी प्रतिपदिकसंज्ञा करके, सु, रुत्वविसर्ग करने पर उक्त तीनों रूप सिद्ध होते हैं।

दुष्पानः सोमो भवता= आपके द्वारा सोमरस का पान कर पाना कठिन है।

ईषत्पानः सुपानो वा सोमो भवता= आपके द्वारा सोमरस का पान आसानी से हो सकता है।