Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 876
खल्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ईषद्दुःसुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल्
Aṣṭādhyāyī 3.3.126
Vṛtti Varadarājācārya

करणाधिकरणयोरिति निवृत्तम्। एषु दुःखसुखार्थेषूपपदेषु खल्। तयोरेवेति भावे कर्मणि च। कृच्छ्रे- दुष्करः कटो भवता। अकृच्छ्रे- ईषत्करः। सुकरः। युच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८७६- ईषद्दुस्सुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल्। ईषच्च दुश्च सुश्च तेषामितरेतरद्वन्द्व ईषद्दुस्सवस्तेषु। कृच्छ्रञ्च अकृच्छ्रञ्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः कृच्छ्राकृच्छ्रे, तौ अर्थों येषां ते कृच्छ्राकृच्छ्रार्थास्तेषु। ईषद्दुस्सुषु सप्तम्यन्तं, कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु सप्तम्यन्तं, खल् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है। इस सूत्र में करणाधिकरणयोश्च की निवृत्ति हो गई है।

दुःख और सुख अर्थ वाले ईषत्, दुस् एवं सु उपपद होने पर धातु से खल् प्रत्यय होता है।

खकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा होती है। अन्त्य लकार तो इत्संज्ञक है ही। इस तरह केवल अ मात्र शेष बचता है। सूत्र में ईषद्दुस्सुषु ऐसा सप्तमीनिर्देश होने के कारण इनकी तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से उपपदसंज्ञा होती है, अतः उपपदसमास भी होगा। तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः के अनुसार भाव और कर्म अर्थ में ही यह प्रत्यय होता है।

दुष्करः। ईषत्करः। सुकरः। कृच्छ्र अर्थात् कष्ट अर्थ में दुस् पूर्वक कृ धातु और अकृच्छ्र अर्थात् सुख अर्थ में सु और ईषत् पूर्वक कृ धातु यहाँ पर प्रदर्शित है। दुःखेन क्रियते इति दुष्करः अर्थात् जो कष्ट से बनाया जा सके और सुखेन क्रियते इति सुकरः अर्थात् जो आसानी से बनाया जा सके। सुखार्थ में ही ईषत् का भी प्रयोग है। अतः ईषत्करः भी बनता है। यहाँ पर दुस्, ईषत् और सु उपपद में हैं और कृ धातु है। ईषद्दुस्सुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् से खल् प्रत्यय करके अनुबन्धलोप होने पर कृ को आर्धधातुकगुण, रपर करके क्रमशः दुष्कर, ईषत्कर, सुकर बनते हैं। इनकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके, सु, रुत्वविसर्ग करने पर उक्त तीनों रूप सिद्ध होते हैं। दुष्करः कटो भवता= आपके द्वारा चटाई का बनना कठिन है। ईषत्करः सुकरो वा कटो भवता= आपके द्वारा चटाई आसानी से बन सकती है। खल् प्रत्यय के कर्म अर्थ में होने से अनुक्त कर्ता में तृतीया होकर भवता हुआ और कर्म के उक्त होने से कटः कर्म के अनुसार ईषत्करः, सुकरः, दुष्करः बन गये।