Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 875
घञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
हलश्च
Aṣṭādhyāyī 3.3.121
Vṛtti Varadarājācārya

हलन्ताद् घञ्। घापवादः। रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति रामः।

अपमृज्यतेऽनेन व्याध्यादिरित्यपामार्गः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८७५- हलश्च। हलः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। करणाधिकरणयोश्च से करणाधिकरणयोः और पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण से पुंसि, संज्ञायाम्, प्रायेण तथा अवे तृस्त्रोर्घञ् से घञ् की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

हलन्त धातुओं से करण और अधिकरण अर्थ में घञ् होता है पुँल्लिङ्ग में।

यह घ प्रत्यय का अपवाद है।

रामः। रमन्ते योगिनोऽस्मिन्। जिसमें योगीजन रमण करते हैं, अर्थात् आनन्दित रहते हैं, उसे राम कहते हैं। रमु क्रीडायाम् धातु है। रम् धातु से पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण से घ प्रत्यय की प्राप्ति थी, उसे बाधकर के हलश्च से घञ् हुआ। अनुबन्धलोप होने के बाद रम्+अ बना। अत उपधायाः से उपधाभूत अकार की वृद्धि होकर राम बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि करने पर रामः सिद्ध होता है।

अपामार्गः। अपमृज्यते व्याध्यादिरनेन। जिससे रोग आदि दूर किये जाते हैं, वह औषधविशेष। अप उपसर्ग है और मृजू शुद्धौ धातु है। मृजू धातु से पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण से घ प्रत्यय की प्राप्ति थी, उसे बाधकर के हलश्च से घञ् हुआ। अनुबन्धलोप होने के बाद अप+मृज्+अ बना। मृजेर्वृद्धिः से ऋकार की वृद्धि, रपर, रेफ का ऊर्ध्वगमन होकर

अप+मार्ज्+अ बना। घित् होने के कारण चजोः कु घिण्यतोः से जकार को कुत्व करके अप+मार्ग्+अ बना। उपसर्गस्य घञ्मनुष्ये बहुलम् से उपसर्ग के अकार को दीर्घ करके अपामार्ग बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि करने पर अपामार्गः सिद्ध होता है।