Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 874
घञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अवे तॄस्त्रोर्घञ्
Aṣṭādhyāyī 3.3.120
Vṛtti Varadarājācārya

अवतारः कूपादेः। अवस्तारो जवनिका।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८७४- अवे तृस्त्रोर्घञ्। तृ च स्तृ च तृस्त्रौ, तयो तृस्त्रोः। अवे सप्तम्यन्तं, तृस्त्रोः षष्ठ्यन्तं, घञ् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। करणाधिकरणयोश्च से करणाधिकरणयोः और पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण से पुंसि, संज्ञायाम्, प्रायेण की अनुवृत्ति है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार तो है ही।

अव उपसर्ग उपपद में होने पर तृ धातु और स्तृ धातुओं से करण और अधिकरण अर्थ में प्रायः घञ् होता है पुँल्लिङ्ग में।

घकार और ञकार इत्संज्ञक हैं, अ शेष रहता है। जित् होने के कारण वृद्धि होगी।

अवतारः। अवतरन्त्यनेन। जिसके द्वारा स्नान आदि के लिए नीचे उतरते हैं, घाट, नदी, कुँआ आदि। तृ प्लवनसन्तरणयोः। अव+तृ में अवे तृस्त्रोर्घञ् से घञ्, अनुबन्धलोप करके अव+तृ+अ बना। जित् के परे होने परे तृ के ऋकार की अचो ञ्णिति से वृद्धि-रपर होकर अवतार बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, रुत्वविसर्ग करके अवतारः सिद्ध हुआ।

अवस्तारः। अवस्तीर्यन्तेऽनेन। जिससे ढकते हैं, परदा आदि। स्तृञ् आच्छादने। अव+स्तृ में अवे तृस्त्रोर्घञ् से घञ् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप करके अव+स्तृ+अ बना। जित् के परे होने परे स्तृ के ऋकार की अचो ञ्णिति से वृद्धि, रपर होकर अवस्तार बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, रुत्वविसर्ग करके अवस्तारः सिद्ध हुआ।