द्विप्रभृत्युपसर्गहीनस्य छादेर्ह्रस्वो घे परे।
दन्ताश्छाद्यन्तेऽनेनेति दन्तच्छदः। आकुर्वन्त्यस्मिन्नित्याकरः।
८७३- छादेर्घेऽद्व्युपसर्गस्य। द्वौ उपसर्गौ यस्य स द्व्युपसर्गः। न द्व्युपसर्गः अद्व्युपसर्गस्तस्य। छादेः षष्ठ्यन्तं, घे सप्तम्यन्तम्, अद्व्युपसर्गस्य षष्ठ्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। खचि ह्रस्वः से ह्रस्वः और ऊदुपधाया गोहः से उपधायाः की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।
दो या दो से अधिक उपसर्गों से युक्त न हो ऐसे छाद् अङ्ग की उपधा को ह्रस्व होता है घ प्रत्यय के परे होने पर।
दन्तच्छदः। दन्ताश्छाद्यन्तेऽनेन। जिससे दाँत ढके जाते हैं। छद अपवारणे। छद धातु से णिच् करने पर छादि बनता है। ण्यन्त होने से सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञक तो है ही। अतः उससे पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण से घ प्रत्यय, अनुबन्धलोप होने पर छादि+अ बना। णेरनिटि से णि का लोप होता है। इस तरह छाद बन जाता है। इससे पूर्व में दन्त है। कृत् के योग में कर्तृकर्मणोः कृति से षष्ठी विभक्ति प्राप्त हुई, उसका षष्ठी समास करके लुक् हो जाता है। दन्त+छाद में छे च से तुक् का आगम, तकार को श्चुत्व करके दन्तच्छाद बना है। छादेर्घेऽद्व्युपसर्गस्य से छाद्+अ में छकारोत्तरवर्ती आकार को ह्रस्व होकर दन्तच्छद यह प्रातिपदिक बन जाता है। उससे स्वादिकार्य करके दन्तच्छदः।
आकरः। आकुर्वन्त्यस्मिन्। जहाँ मनुष्य अनेक प्रकार के खनिज प्राप्त करते हैं, खान। आ+कृ धातु से पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण से घ प्रत्यय, अनुबन्धलोप होने पर आ+कृ+अ बना। प्रत्यय की आर्धधातुकसंज्ञा, धातु को गुण, रपर करके आकर प्रातिपदिक बनता है। उससे स्वादिकार्य करके आकरः सिद्ध हो जाता है। इसी तरह नि+ली से निलयः, आ+ली से आलयः आदि भी बनाये जा सकते हैं।