Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 858
मप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
क्त्रेर्मम् नित्यम्
Aṣṭādhyāyī 4.4.20
Vṛtti Varadarājācārya

क्विप्रत्ययान्तान्मप् निर्वृत्तेऽर्थे। पाकेन निर्वृत्तं पक्वित्रमम्। दुवप् उज्जित्रमम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८५८- क्वेर्मम्नित्यम्। क्वेत्रः पञ्चम्यन्तं, मप् प्रथमान्तं, नित्यम् क्रियाविशेषणं द्वितीयान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। निर्वृत्तेऽक्षद्यूतादिभ्यः से निर्वृत्ते की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च और तद्धिताः का अधिकार है।

..... क्विप्रत्ययान्त शब्द से मप् प्रत्यय होता है निर्वृत्त अर्थ में।

निर्वृत्त का अर्थ है- उत्पन्न हुआ, सिद्ध हुआ, रचा गया, बनाया गया आदि।

पाकेन निर्वृत्तं पक्वित्रमम्। पाक से उत्पन्न, तैयार हुआ। डुपचष् पाके। पच् धातु डिवत् है। अतः इससे डिवतः क्वित्रः से क्वित्र प्रत्यय हुआ। ककार की इत्संज्ञा करके लोप। पच्+त्रि बना। चकार को कुत्व होकर पक्वित्र बना। इससे क्वेर्मम्भिन्त्यम् से मप् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप करके पक्वित्रम बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम् आदेश करके पक्वित्रमम् सिद्ध हुआ। इसी प्रकार डुवप् बीजसन्ताने धातु है। वह भी डिवत् है। अतः वप् से क्वित्र करके वप्+त्रि बना है। वचिस्वपियजादीनां किति से सम्प्रसारण होने के बाद पूर्वरूप होकर उच्चित्र बना। उससे मप् करने के बाद उच्चित्रम बना है। प्रातिपदिकत्वात् सु, अम् करके उच्चित्रमम् सिद्ध हुआ। बोना, गर्भाधान करना आदि।