Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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Govind
LSK 857
क्विप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ड्वितः क्त्रिः
Aṣṭādhyāyī 3.3.88
Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८५७- द्विवतः क्वित्रः। दुः इद् यस्य स द्विवत्, तस्मात्। द्विवतः पञ्चम्यन्तं, क्वित्रः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। भावे और अकर्तरि च कारके की अनुवृत्ति है तो धातोः, प्रत्ययः और परश्च का अधिकार है।

दु की इत्संज्ञा हुई हो, ऐसी धातु से भाव और कर्तृभिन्न कारक अर्थ में क्वित्र प्रत्यय होता है।

ककार इत्संज्ञक है, त्रि शेष रहता है। दुपचष् पाके आदि धातुओं में दु की इत्संज्ञा हुई होती है। केवल क्विप्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता है, उसके साथ अग्रिम सूत्र से मप् प्रत्यय भी जोड़ते हैं। क्वित्र यह कृत् प्रत्यय है तो मप् यह तद्धित प्रत्यय है।