ऋवर्णान्तादुवर्णान्ताच्चाप्। करः। गरः। यवः। लवः। स्तवः। पवः।
वार्तिकम्- घजर्थे कविधानम्। प्रस्थः। विघ्नः।
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८५६- ऋदोरप्। ऋत् च उश्च तयोः समाहाराद्वन्द्व ऋदुः, सौत्रं पुस्त्वम्। तस्माद् ऋदोः। ऋदोः पञ्चम्यन्तम्, अप् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। यहाँ पर भावे और संज्ञायाम् को छोड़कर अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् ये दोनों सूत्र पूरे के पूरे अनुवृत्त हो रहे हैं और धातोः, प्रत्ययः और परश्च का अधिकार है।
दीर्घ-ऋवर्णान्त धातु और उवर्णान्त धातुओं से अप् प्रत्यय होता है भाव या कर्ता से भिन्न कारक में।
पकार की इत्संज्ञा होकर केवल अ शेष रहता है। उसकी आर्धधातुकसंज्ञा होती है और उसके परे गुण आदि हो जाते हैं।
करः। करणं करः। बिखेरना। कृ विक्षेपे। इससे ऋदोरप् से अप्, अनुबन्धलोप, उसकी आर्धधातुकसंज्ञा, आर्धधातुकगुण करके कर्+अ, वर्णसम्मेलन होकर कर यह प्रातिपदिक बना। स्वादिकार्य होकर करः सिद्ध होता है।
पवः। पवनं पवः। पूञ् पवने। उवर्णान्त होने के कारण ऋदोरप् से अप् आदि होकर गुण होने पर पो+अ, अवादेश, वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकसंज्ञा करके स्वादिकार्य करने पर पवः बन जाता है।
लवः। लवनं लवः। लूञ् छेदने। उवर्णान्त होने के कारण ऋदोरप् से अप् आदि होकर गुण होने पर लो+अ, अवादेश, वर्णसम्मेलन, प्रातिपदिकसंज्ञा करके स्वादिकार्य करने पर लवः बन जाता है।
घञर्थे कविधानम्। यह वार्तिक है। जिस अर्थ में घञ् का विधान किया गया है, उसी अर्थ में क प्रत्यय का विधान कहना चाहिए। यह महाभाष्य का वार्तिक है जो कि घञर्थे कविधानं स्थास्नापाव्यधिहनियुध्यर्थम् इस रूप में है। घञ् के अर्थ में स्था, स्ना, पा, व्यध्, हन् और युध् धातुओं से परे क का विधान करना चाहिए। अतः प्रस्थः, विघ्नः में घ जिस अर्थ में होता है, उसी अर्थ में क प्रत्यय हुआ है।
प्रस्थः। प्रतिष्ठतेऽस्मिन् धान्यानि। जिसमें धान्य आदि का मान होता है, एक मान विशेष। प्राचीन काल का यह माप है। ष्ठा गतिनिवृत्तौ। प्र पूर्वक स्था धातु से घञर्थ अर्थात् भाव और संज्ञाविषयक कर्तृभिन्न कारक अर्थ में घञर्थे कविधानम् वार्तिक से क प्रत्यय, अनुबन्ध ककार की इत्संज्ञा, लोप करके प्र+स्था+अ बना। आतो लोप इटि च से धातु के आकार का लोप करके प्रस्थ बन गया। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके स्वादिकार्य करने पर प्रस्थः सिद्ध हुआ।
विघ्नः। विहन्यन्तेऽस्मिन्। रूकावट, विघ्न। हन हिंसागत्योः। वि पूर्वक हन् धातु से घञर्थ अर्थात् भाव और संज्ञाविषयक कर्तृभिन्न कारक अर्थ में घञर्थे कविधानम् वार्तिक से क प्रत्यय, अनुबन्ध ककार की इत्संज्ञा, लोप करके वि+हन्+अ बना। अजादि कित् के परे रहते गमहनजनखनघसां लोपः क्वित्यनङि से धातु के उपधाभूत अकार का लोप करके वि+हन्+अ बना। हकार को हो हन्तेञ्जिन्नेषु से कुत्व करके वर्णसम्मेलन करने पर विघ्न बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके स्वादिकार्य करने पर विघ्नः सिद्ध हुआ।