Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 849
तुमुण्वुल्प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्
Aṣṭādhyāyī 3.3.10
Vṛtti Varadarājācārya

क्रियार्थायां क्रियायामुपपदे भविष्यत्यर्थे धातोरेतौ स्तः।

मान्तत्वादव्ययत्वम्। कृष्णं द्रष्टुं याति। कृष्णं दर्शको याति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब लघुसिद्धान्तकौमुदी में कृदन्त का अन्तिमप्रकरण उत्तरकृदन्त का आरम्भ होता है। इस प्रकरण में मुख्यतया तुमुन्, ण्वुल्, घञ्, अच्, अप्, क्तिन्, क्त्वा और णमुल् आदि प्रत्यय बताये जा रहे हैं। उणादयो बहुलम् के पहले का प्रकरण पूर्वकृदन्त और बाद का प्रकरण उत्तरकृदन्त है।

८४९- तुमुण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्। तुमन् च ण्वुल् च तयोरितरेतरद्वन्द्वस्तुमुन्ण्वुलौ। क्रिया अर्थः (प्रयोजनं) यस्याः सा क्रियार्था, तस्यां, बहुव्रीहिः। तुमुण्वुलौ प्रथमान्तं, क्रियायां सप्तम्यन्तं, क्रियार्थायां सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में धातोः, प्रत्ययः और परश्च का अधिकार है। भविष्यति गम्यादयः से भविष्यति की अनुवृत्ति आती है।

एक क्रिया के लिए दूसरी क्रिया समीप में होने पर भविष्यत् काल में धातु से परे तुमुन् और ण्वुल् प्रत्यय होते हैं।

किसी क्रिया की सिद्धि के लिए जब दूसरी क्रिया की जाती है तो वह दूसरी क्रिया पहली क्रिया की क्रियार्था क्रिया कहलाती है। जैसे भोक्तुं गच्छति= खाने के लिए जाता है। यहाँ खाना इस क्रिया के लिए ही गमनरूपी दूसरी क्रिया हो रही है। यही दूसरी क्रिया ही क्रियार्था क्रिया है। भविष्यत् काल का अर्थ इसलिए है कि अभी खाने के लिए जा रहा है अर्थात् खाया नहीं है। तुमुन्-प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग खूब होता है किन्तु इस अर्थ में ण्वुल्प्रत्ययान्त शब्द का प्रयोग कम ही होता है। तुमुन् में नकार की हलन्त्यम् से और उकार की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होकर लोप होने पर तुम् शेष रहता है। तुम् मान्त है। मान्त कृदन्त शब्द की कृमेजन्तः से अव्ययसंज्ञा होती है अर्थात् मान्त कृदन्त शब्द अव्यय होता है। आपको स्मरण होगा ही कि अव्यय का केवल एक ही रूप होता है अर्थात् अन्य सुबन्त की तरह सातों विभक्तियों के रूप नहीं होते।

तुम् की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा होती है। यदि धातु सेट् होगा तो आर्धधातुकस्येड् वलादेः से इट् का आगम होगा और अनिट् होगा तो इट् नहीं होगा।

..... पठितुं गच्छति। पढ़ने के लिए जाता है। यहाँ पर पढ़ने के लिए दूसरी क्रिया गमन करना है। ऐसी स्थिति में पठ् धातु से तुमन्, अनुबन्धलोप, पठ्+तुम् बना। तुम् की आर्धधातुकसंज्ञा और उसको इट् का आगम हुआ, पठ्+इ+तुम् बना। वर्णसम्मेलन होने पर पठितुम् बना। अव्ययसंज्ञा, प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु विभक्ति और अव्यय होने के कारण अव्ययादाप्सुपः से सु का लुक् हुआ, पठितुम्।

कृष्णं द्रष्टुं याति। कृष्ण को देखने के लिए जाता है। यहाँ पर भी देखने के लिए दूसरी क्रिया गमन करना है। ऐसी स्थिति में दृश् धातु से तुमन्, अनुबन्धलोप, दृश्+तुम् बना। तुम् की आर्धधातुकसंज्ञा और उसको इट् का आगम प्राप्त हुआ। उसका एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हुआ! दृश्+तुम् में सृजिदृशोर्झल्यमकिति से अम् आगम, मित् होने से अन्त्य अच् का अवयव बना। दृ+अश् बना। यण् होकर दृ+र्+अश्, वर्णसम्मेलन होने पर द्रश्+तुम् बना। व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजश्छशां षः से शकार के स्थान पर षकार आदेश, षकार से परे प्रत्यय के तकार को ष्टुत्व करके द्रष्टुम् बना। मान्त होने के कारण कृन्मेजन्तः से अव्ययसंज्ञा करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सु विभक्ति और अव्यय होने के कारण अव्ययादाप्सुपः से सु का लुक् हुआ, द्रष्टुम्।

कृष्णं दर्शको याति। कृष्ण को देखने के लिए जाता है। यहाँ पर देखने के लिए जाना एक क्रिया के लिए दूसरी क्रिया हो रही है। अतः दृश् धातु से ण्वुल् प्रत्यय हो गया। अनुबन्धलोप होने के बाद वु बचा। उसके स्थान पर अक आदेश हो गया। दृश्+अक बना। पुगन्तलघूपधस्य च से दृ के ऋकार को अर्-गुण हुआ, दृ+अर्+श्+अक बना। वर्णसम्मेलन होने पर दर्शक बना, रेफ का ऊर्ध्वगमन हुआ, दर्शक बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा हुई, सु, रुत्वविसर्ग होकर दर्शकः सिद्ध हुआ। याति के परे होने पर सु को जो रु हुआ था, उस रेफ के स्थान पर हशि च से उत्व और गुण होकर दर्शको याति बना है। ८५०- कालसमयवेलासु तुमन्। कालश्च समयश्च वेला च तेषामितरेतरद्वन्द्वः कालसमयवेलास्तासु। कालसमयवेलासु सप्तम्यन्तं, तुमन् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः और परश्च का अधिकार है।