एते वर्तमाने संज्ञायां च बहुलं स्युः। केचिदविहिता अप्यूह्याः।
संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे।
कार्याद्विद्यादनूबन्धमेतच्छास्त्रमुणादिषु॥
इत्युणादिप्रकरणम्॥३५॥
अब उणादिप्रकरण प्रारम्भ करते हैं। उणादिप्रत्ययान्त शब्दों को कुछ आचार्य व्युत्पन्न मानते हैं तो कुछ आचार्य अव्युत्पन्न। विद्वानों के इसमें दो मत हैं। कुछ तो कहते हैं- पाणिनि के मत में औणादिक शब्द अव्युत्पन्न हैं परन्तु कुछ कहते हैं कि उणादयो बहुलम् इस सूत्र को बनाकर पाणिनि ने व्युत्पन्न माना है। कृदन्तप्रकरण के बीच में पाणिनि जी का लिखा एक ही सूत्र आता है, वह है उणादयो बहुलम्। इस सूत्र से पाणिनि जी ने उणादिप्रत्ययों का विधान किया है किन्तु वे प्रत्यय कौन-कौन हैं और किन-किन अर्थों में किस-किस से होते हैं, यह जान नहीं सकते। अतः शाकटायनमुनि के रचित पञ्चपादी उणादिसूत्र जिसमें लगभग साढ़ेसात सौ सूत्रों द्वारा सवा तीन सौ के करीब प्रत्ययों का प्रतिपादन किया गया है, का आश्रय लिया गया है। संस्कृत शास्त्र में अनेकों शब्द ऐसे हैं, जिनकी सिद्धि अष्टाध्यायी के सूत्रों से नहीं हो पाती है, उन सारे शब्दों को उणादि के अन्तर्गत सिद्ध मान लिया जाता है। हम इस प्रपञ्च में न पड़कर यही मानते हैं कि उणादि प्रत्ययों के विना पाणिनीय व्याकरण शास्त्र अधूरा है। अतः उणादिप्रकरण का सामान्य एवं संक्षिप्त ज्ञान कराते हैं।
शब्दसागर अथाह है। अतः उणादि में कितने प्रत्यय हो सकते हैं, इसका कथन भी असम्भव ही है, तथापि जो प्रचलित हैं, उनका ज्ञान भी शाकटायनमुनि के उणादिसूत्रों से पता चलेगा। यहाँ तो बस, एक ही सूत्र का उदाहरण देखते हैं।
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कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्। कृ, वा, पा, जि, मि, स्वद्, साध् और अश्
धातुओं से परे उण् प्रत्यय करता है।
करोतीति कारुः। कृ धातु से कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण् से उण् प्रत्यय,
अनुबन्धलोप, कृ+उ, कृ की वृद्धि, कारु+उ, वर्णसम्मेलन, कारु बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा,
सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग, कारुः सिद्ध हुआ। जो करता है, वह कारु है।
वातीति वायुः। वा गतिगन्धनयोः। वा धातु से उण् होने के बाद आतो युक्
चिण्कृतोः से युक् का आगम होकर उसका अनुबन्धलोप करके य् शेष बचा, वा+य्+उ
बना, वर्णसम्मेलन हुआ- वायु। प्रातिपदिकसंज्ञा, स्वादिकार्य- वायुः। वहने वाला- वायुः।
पायुर्गुदम्। पा रक्षणे। पाति=रक्षति अपानादिनिःसारणद्वारा शरीरमिति। अपान वायु
आदि निकालकर शरीर की सुरक्षा करता है, ऐसा अङ्ग। पा धातु से उण्, युक् करके
पा+य्+उ बना, वर्णसम्मेलन करके पायु बना, प्रातिपदिकसंज्ञा और स्वादिकार्य से पायुः
सिद्ध हुआ।
जायुरौषधम्। जि अभिभवे। जो रोगों पर विजय प्राप्त करता है, औषध। जितने
के अर्थ में प्रयुक्त जि धातु से उण्, अनुबन्धलोप, जि की वृद्धि, जै+उ, आय् आदेश,
जाय्+उ, वर्णसम्मेलन, जायु, स्वादिकार्य करके जायुः सिद्ध हुआ।
मायुः पित्तम्। फेंकने के अर्थ में प्रयुक्त मि धातु है। जो शरीर में अतिरिक्त ऊष्मा
आदि को फेंकता हो, पित्त नामक अंग। मि से उण्, वृद्धि, आय् आदेश, स्वादिकार्य करके
मायुः सिद्ध हो जाता है।
स्वादुः। स्वद् आस्वादने। स्वदते=रोचते इति स्वादुः। जो अच्छा, स्वादिष्ट लगे,
वह स्वादु। स्वद् से उण्, उपधावृद्धि करके स्वादिकार्य करने पर स्वादुः सिद्ध हो जाता है।
साध्नोति परकार्यमिति साधुः। साध संसिद्धौ। जो दूसरों का उपकार करे, वह
साधु है। साध् धातु से उण् करके वर्णसम्मेलन करके स्वादि कार्य करने पर साधुः सिद्ध
हुआ।
आशु शीघ्रम्। अशूङ् व्याप्तौ। जो शीघ्र सर्वत्र व्याप्त हो जाय। अशू से उण्,
उपधावृद्धि, स्वादिकार्य करके आशु बनता है। इसके रूप नपुंसकलिङ्ग में मधु शब्द की
तरह चलते हैं।
८४८- उणादयो बहुलम्। उण् आदिर्येषां ते उणादयः। उणादयः प्रथमान्तं, बहुलं प्रथमान्तं,
द्विपदमिदं सूत्रम्।
धातुओं से उण् आदि प्रत्यय वर्तमान काल में और संज्ञा में बहुल से होते
हैं।
उण् आदि कहने से यहाँ पर शाकटायनमुनि के रचित उणादिसूत्रों से किये जाने
वाले सभी प्रत्यय समझना ठीक रहेगा। पाणिनि जी ने उन सभी प्रत्ययों को उणादिगण में
समेट लिया, यही जानना हमारे लिए उचित भी है। वे सभी प्रत्यय बहुल से होते हैं। बहुल
का अर्थ अधिकतर नहीं है। यह पारिभाषिक-शब्द है। इसकी परिभाषा बताने के लिए
वैयाकरण जगत में निम्नलिखित श्लोक प्रसिद्ध है-
क्वचित्प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः क्वचिद्विभाषा क्वचिदन्यदेव।
विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति॥
बहुल के चार अर्थ हैं- पहला- क्वचित्प्रवृत्तिः- जहाँ जो कार्य बहुल से हो ऐसा बताया
गया, ऐसा सूत्र जहाँ लगना चाहिए वहाँ तो लगता ही है और जहाँ लगने की योग्यता नहीं है, वहाँ भी लग जाता है। दूसरा- क्वचित् अप्रवृत्तिः- कहीं-कहीं लगने योग्य स्थानों पर भी नहीं लगता। तीसरा- क्वचिद्विभाषा- कहीं कहीं विकल्प से करता है और चौथा- क्वचिद् अन्यद् एव- अर्थात् कहीं कुछ और ही कर देता है। और ही होता है का तात्पर्य यह है कि निर्धारित अर्थ, निर्धारित योग्यता के अतिरिक्त भी कुछ और ही विधान कर देता है। उणादि में प्रकृति और प्रत्यय कैसे होते हैं इसका कथन महाभाष्य में इस प्रकार से किया गया है-
संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे।
कार्याद्विद्यादनूबन्धमेतच्छास्त्रमुणादिषु॥
तात्पर्य यह है कि उणादि के सम्बन्ध में यदि किसी शब्द से प्रत्यय का विधान करने वाला कोई सूत्र न मिले तो स्वयं प्रकृति-प्रत्ययों की कल्पना कर लेनी चाहिए। पूर्वभाग में प्रकृति अर्थात् धातु और परभाग में प्रत्यय की कल्पना करें। उस प्रत्यय में भी शब्दानुरूप कार्य की आवश्यकता को देखते हुए अनुबन्धों को जोड़ लेना चाहिए। जैसे यदि गुण या वृद्धि का अभाव करना हो तो प्रत्यय को कित् या डित्, यदि वृद्धि करनी हो तो प्रत्यय को जित् या णित् करना चाहिए। इसी प्रकार से टिलोप आदि के लिए डित्करण आदि भी कर लेना चाहिए।
पाणिनि जी ने उणादयो बहुलम् को पूर्वकृदन्त और उत्तरकृदन्त के बीच में पढ़ा है। अतः यह भी कृदन्त का ही सूत्र है।
यह तो एक दिग्दर्शन मात्र है, पूर्णज्ञान के लिए शाकटायन के सभी सूत्रों को पढ़ना ही पढ़ेगा।
आपको फिर एक बात याद दिला दूँ की लघुसिद्धान्तकौमुदी व्याकरण शास्त्र में प्रवेश के लिए प्रवेशिका अर्थात् प्रवेश-परीक्षात्मक ग्रन्थ है। जैसे आजकल विद्यालयों में प्रवेश के लिए पहले प्रवेशः परीक्षा ली जाती है और छात्र उसमें उत्तीर्ण होने के लिए उस प्रकार की पुस्तकें पढ़ते हैं, जिससे अवश्य उत्तीर्ण हों, इसके वे लिए बहुत तैयारी करते हैं। इसी तरह इस कौमुदी को भी यही समझें कि व्याकरणशास्त्र में प्रवेश के लिए योग्यता प्राप्त कराने वाला यह ग्रन्थ है।
यह भी नहीं है कि इसके ज्ञान से केवल सामान्य ज्ञान मात्र होगा। यदि इस ग्रन्थ को आद्योपान्त अच्छी तरह पढ़ लिया गया, इसको अच्छी तरह से लगा लिया तो व्याकरण जगत् के अनेक नियम और उपनियमों का ज्ञान हो जायेगा और व्यावहारिक एवं अधिक प्रचलित शब्दों के विषय में आत्मनिर्भर भी बना जा सकेगा क्योंकि संज्ञाप्रकरण से लेकर सन्धि, सुबन्त, तिङन्त, कृदन्त, कारक, समास, तद्धित और स्त्रीप्रत्यय प्रकरणों के मुख्य विषय इसमें समाविष्ट हैं। लगभग सभी प्रकरणों का मार्गदर्शन किया गया है। अतः जिनको महावैयाकरण नहीं बनना है और संस्कृत भाषा का सामान्य ज्ञान करके अन्य शास्त्रों का अध्ययन करना है, उनके लिए यह ग्रन्थ पर्याप्त हो सकता है।
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित सारसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
उणादिप्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ उत्तरकृदन्तम्