पवित्रम्।
इति पूर्वकृदन्तम्॥३४॥
धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार तो है ही।
यदि प्रकृति और प्रत्यय के समुदाय से संज्ञा अर्थ निकले तो पू धातु से करण अर्थ में इत्र प्रत्यय होता है।
तात्पर्य यह है कि पू से इत्र प्रत्यय करने पर जो शब्द बने उससे किसी की संज्ञा का बोध हो।
पवित्रम्। पवन्ते पुनन्ति वा अनेन। जिससे पवित्र, शुद्ध होते हैं, वह साधन। वेद के अनुसार इसका अर्थ कुश, जल, वायु, अग्नि आदि है। पूङ् पवने और पूञ् पवने दोनों धातुएँ यहाँ पर ग्राह्य हैं। पू धातु से करण अर्थ में पुवः संज्ञायाम् से इत्र प्रत्यय होकर पू+इत्र बना। इत्र की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके पू के ऊकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण करके अव् आदेश होकर पू+अव्+इत्र, पवित्र बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप, पवित्रम्।
आपने अभी तक जितने धातु पढ़े, उन सभी धातुओं से ण्वुल्, तृच्, क्त, क्तवतु, शतृ और शानच् प्रत्यय लगाकर रूप बनाने का प्रयत्न करें।
संस्कृतभाषा में सभी शब्द प्रायः धातुओं से ही निर्मित हैं। धातुओं से दो तरह के प्रत्यय होते हैं- तिङ् और कृत्। तिङन्त और कृदन्त में लगभग सारे शब्द समाये हैं। कृदन्त
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से तद्धित के प्रत्यय भी होते हैं। अतः कृत्प्रकरण को अच्छी तरह समझ लेने के बाद संस्कृत भाषा में व्युत्पत्ति के लिए कोई परेशानी नहीं आती।
परीक्षा
द्रष्टव्यः- प्रत्येक प्रश्न दस अंक के हैं और अनिवार्य भी हैं।
१- ण्वुल और तृच् प्रत्यय लगाकर पाँच-पाँच रूपों की सिद्धि करें।
१०
२- णिनि, ल्यु, अच्, क, अण् प्रत्यय लगाकर दो-दो रूपों की सिद्धि करें।
१०
३- क्त, क्तवतु प्रत्यय लगाकर पाँच-पाँच शब्दों की सिद्धि करें।
१०
४- शतृ और शानच् प्रत्यय लगाकर किन्हीं पाँच-पाँच शब्दों की सिद्धि करें।
१०
५- ये बारह प्रत्यय करने वाले सूत्रों में आपस में कितनी समानता है, स्पष्ट करें।
१०
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
पूर्वकृदन्त-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ कृदन्त उणादयः।
कृ-वा-पा-जि-मि-स्वदि-साध्यशूभ्य उण्॥१॥
करोतीति कारुः। वातीति वायुः। पायुर्गुदम्। जायुरौषधम्। मायुः पित्तम्।
स्वादुः। साध्नोति परकार्यमिति साधुः। आशु शीघ्रम्।