Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 846
इत्र-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः
Aṣṭādhyāyī 3.2.184
Vṛtti Varadarājācārya

अरित्रम्। लवित्रम्। धुवित्रम्। सवित्रम्। खनित्रम्। सहित्रम्। चरित्रम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८४६- अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः। अर्तिश्च लूश्च धूश्च सूश्च खनश्च सहश्च चर् च तेषां समाहारद्वन्द्वः, अर्तिलूधूसूखनसहचर, तस्मात्। अर्तिलूधूसूखनसहचरः पञ्चम्यन्तम्, इत्रः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से करणे की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार तो है ही।

ऋ, लू, धू, सू, खन्, सह् और चर् धातुओं से करण अर्थ में इत्र प्रत्यय होता है।

अरित्रम्। ऋच्छन्त्यनेन। जिससे ले जाते हैं, चलाते हैं वह साधन, नौका का चप्पू। ऋ गतिप्रापणयोः। ऋ धातु से करण अर्थ में अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः से इत्र प्रत्यय होकर ऋ+इत्र बना। इत्र की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके ऋ को सार्वधातुकार्धतुकयोः से गुण, रपर होकर अर्+इत्र, अरित्र बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप, अरित्रम्।

लवित्रम्। लुनन्त्यनेन। जिससे काटते हैं, वह साधन, दात्र, दतिया, आरीनुमा काटने का हँसुआ आदि। लूञ् छेदने। लू धातु से करण अर्थ में अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः से इत्र प्रत्यय होकर लू+इत्र बना। इत्र की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके लू के ऊकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण, अव् आदेश होकर ल्+अव्+इत्र, लवित्र बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप, लवित्रम्।

धुवित्रम्। धुवन्त्यनेन। जिससे आग आदि को प्रज्वलित करते हैं, फूँकते हैं, वह साधन, पंखा, बांस आदि की फूँकनी। धू विधूनने। धू धातु से करण अर्थ में अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः से इत्र प्रत्यय होकर धू+इत्र बना। इत्र की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके लू के ऊकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण प्राप्त था किन्तु कुटादि गण में इसके आने के कारण गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्डित् से डिद्वद्भाव हो जाने से विडन्ति च से गुण का निषेध हुआ। अतः अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ्वङौ से उवङ् आदेश होकर धुव्+इत्र, धुवित्र बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप, धुवित्रम्।

..... सवित्रम्। सुवन्त्यनेन। जिससे प्रेरणाएँ प्राप्त होती हैं वह साधन। षू प्रेरणे। सू धातु से करण अर्थ में अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः से इत्र प्रत्यय होकर सू+इत्र बना। इत्र की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके लू के ऊकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण, अवादेश करके सू+अव्+इत्र, सवित्र बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप, सवित्रम्।

खनित्रम्। खनन्त्यनेन। जिससे खोदते हैं, वह साधन, फावड़ा, खुरपी आदि। खनु अवदारणे। खन् धातु से करण अर्थ में अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः से इत्र प्रत्यय होकर खन्+इत्र, खनित्र बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप, खनित्रम्।

सहित्रम्। सहन्तेऽनेन। सहन करते हैं जिस कार्यकलाप से, वह कार्य। षह मर्षणे। सह् धातु से करण अर्थ में अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः से इत्र प्रत्यय होकर सह्+इत्र, सहित्र बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप, सहित्रम्।

चरित्रम्। चरन्त्यनेन। जिसके द्वारा मनुष्य समाज में चल सकते हैं, वह आचरण, स्वभाव, व्यवहार आदि। चर गतिभक्षणयोः। चर् धातु से करण अर्थ में अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः से इत्र प्रत्यय होकर चर्+इत्र, चरित्र बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अम्, पूर्वरूप, चरित्रम्। ८४७- पुवः संज्ञायाम्। पुवः पञ्चम्यन्तं, संज्ञायां सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः से इत्रः और दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से करणे की अनुवृत्ति आती है।