Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 845
इण्निपेधकं विधिसूत्रम्
तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च
Aṣṭādhyāyī 7.2.9
Vṛtti Varadarājācārya

एषां दशानां कृत्प्रत्ययानामिण् न। शस्त्रम्। योत्रम्। योक्त्रम्। स्तोत्रम्।

तोत्रम्। सेत्रम्। सेक्त्रम्। मेढ्रम्। पत्त्रम्। दंष्ट्रा। नद्धी।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८४५- तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च। तिश्च तुश्च त्रश्च तश्च थश्च सिश्च सुश्च सरश्च

कश्च सश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वस्तितुत्रतथसिसुसरकसास्तेषु। तितुत्रतथसिसुसरकसेषु सप्तम्यन्तं,

च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। नेड् वशि कृति से न, इट् और कृति की अनुवृत्ति आती

है।

ति, तु, त्र, त, थ, सि, सु, सर, क और स इन कृत्प्रत्ययों को इट् का

आगम नहीं होता।

सेट् धातुओं से प्राप्त इट् के निषेध के लिए है। अनिट् धातुओं से तो एकाच

उपदेशेऽनुदात्तात् से ही निषेध सिद्ध है।

शस्त्रम्। जिससे हिंसा की जाती है, वह साधन, हथियार। शसति हिनस्ति अनेन।

शसु हिंसायाम्। शस् धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन्

प्रत्यय, अनुबन्धलोप लोप, शस्+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका

तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च से निषेध हो गया। शस्त्र की प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग

में अम् आदेश करके शस्त्रम् सिद्ध हुआ।

योत्रम्। युवन्त्यनेन। जिससे बाँधते हैं वह साधन, रस्सी। यु मिश्रणे। यु धातु से

दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, यु+त्र

बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च से निषेध हो गया।

यु को आर्धधातुकगुण होकर योत्र बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग में अम्

आदेश करके योत्रम् सिद्ध हुआ।

योक्त्रम्। युञ्जन्त्यनेन। जिससे जोड़ा जाता है वह साधन, रस्सी। यु मिश्रणे। यु

धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप,

यु+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हो

गया। युज् को लघूपधगुण होकर योज्+त्र बना। जकार को कुत्व और उसको चर्त्व करके

योक्त्र बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग में अम् आदेश करके योक्त्रम् सिद्ध

हुआ।

.....

स्तोस्त्रम्। स्तुवन्त्यनेन। जिससे स्तुति की जाती है वह साधन, स्तव, मन्त्र आदि। ष्टुञ् स्तुतौ। स्तु धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, स्तु+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हो गया। स्तु को आर्धधातुकगुण होकर स्तोत्र बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग में अम् आदेश करके स्तोत्रम् सिद्ध हुआ।

तोत्रम्। तुदन्त्यनेन। जिससे पीटते हैं वह साधन, चाबुक, डंडा, अंकुश आदि। तुद व्यथने। तुद धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तुद+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हो गया। तुद को उपधागुण होकर और दकार को खरि च से चर्त्व होकर तोत्र बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग में अम् आदेश करके तोत्रम् सिद्ध हुआ।

सेत्रम्। सिन्वन्त्यनेन। जिससे बाँधते हैं, वह साधन, बेड़ी, हथकड़ी इत्यादि। षिञ् बन्धने। सि धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, सि+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हो गया। सि को आर्धधातुगुण होकर सेत्र बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग में अम् आदेश करके सेत्रम् सिद्ध हुआ।

सेक्त्रम्। सिञ्चन्त्यनेन। जिससे सींचा जाय वह साधन, सींचने का पात्र। षिच क्षरणे। सिच् धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, सिच्+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हो गया। स्तु को आर्धधातुगुण होकर सेच्+त्र बना। चकार को कुत्व करके सेक्त्र बनता है। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग में अम् आदेश करके सेक्त्रम् सिद्ध हुआ।

मेढ्रम्। मेहन्त्यनेन। जिससे मूत्रत्याग किया जाय वह साधन, मूत्रेन्द्रिय। मिह सेचने। मिह् धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, मिह+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हो गया। मिह्+त्र उपधागुण होने के बाद हकार को हो ढः से ढत्व, झषस्तथोर्धोऽधः से तकार को धत्व करके ढकार के योग में धकार को ष्टुत्व करके मेढ्+ढ्र बना। ढो ढे लोपः से पूर्व ढकार का लोप करके मेढ्र बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग में अम् आदेश करके मेढ्रम् सिद्ध हुआ।

पत्रम्। पतन्त्यनेन। जिसके द्वारा पक्षी आदि उड़ते हैं, वह साधन, पंख आदि। पत्लृ पतने। पत् धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, पत्+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च से निषेध हो गया। पत्र बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, नपुंसकलिङ्ग में अम् आदेश करके पत्रम् सिद्ध हुआ।

दंष्ट्रा। दशन्त्यनया। जिसके द्वारा काटते हैं वह साधन, बड़ा दाँत, दाढ़ आदि। दंश दंशने। दंश धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, दंश्+त्र बना। वलादिलक्षण इट् प्राप्त था, उसका एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से निषेध हो गया। दंश् के शकार के स्थान पर व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजश्छशां षः से षकार आदेश, उससे पर प्रत्यय के तकार को ष्टुत्व करके दंष्ट्र बना। षित् होने के कारण षिद्गौरादिभ्यश्च से डीष् प्राप्त था किन्तु दंष्ट्र शब्द के अजादिगण में होने के कारण उसे

बाधकर के अजाद्यतष्टाप् से टाप् होकर दंष्ट्रा बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, हल्ड्यादिलोप करके दंष्ट्रा सिद्ध हुआ।

नद्धी। नह्यतेऽनया। जिसके द्वारा बाँधा जाता है, वह साधन, चमड़े की रस्सी आदि। णह बन्धनो। नह् धातु से दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे से ष्ट्रन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, नह्+त्र बना। नहो धः से हकार के स्थान पर धकार आदेश, उससे पर प्रत्यय के तकार को झषस्तथोर्धोऽधः से धकार आदेश करके पूर्वधकार को जश्त्व करने पर नद्ध बना। षित् होने के कारण षिद्गौरादिभ्यश्च से डीष् होकर नद्धी बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, हल्ड्यादिलोप करके नद्धी सिद्ध हुआ।

आचार्य कहीं तो इट् का निषेध करने के लिए तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च सूत्र को बनाते हैं और कहीं अप्राप्त इट् का विधान न करके ष्ट्रन् प्रत्यय और इट् आगम के स्थान पर सीधे इत्र प्रत्यय करते हैं। अग्रिम सूत्र को देखिये।