Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 841
क्विप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपॄजुग्रावस्तुवः क्विप्
Aṣṭādhyāyī 3.2.177
Vṛtti Varadarājācārya

विभ्राट्। भाः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८४१- भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपृजुग्रावस्तुवः क्विप्। भ्राजश्च भासश्च धुर्विश्च द्युतश्च ऊर्जिश्च पृ च जुश्च ग्रावस्तुश्च तेषां समाहारद्वन्द्वो भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपृजुग्रावस्तु, तस्मात्। भ्राजभास-धुर्विद्युतोर्जिपृजुग्रावस्तुवः पञ्चम्यन्तं, क्विप् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का तो अधिकार है ही साथ ही आक्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु से तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु का भी अधिकार है।

भ्राज्, भास्, धुर्व, द्युत्, ऊर्ज्, पृ, जु और ग्राव-पूर्वक स्तु धातुओं से तच्छील, तद्धर्म और तत्साधुकारी कर्ता अर्थ में क्विप् प्रत्यय होता है।

क्विप् में ककार, इकार, पकार की इत्संज्ञा होकर उनका लोप होता है तो शेष वकार का वेरपृक्तस्य से लोप होता है। इस तरह क्विप् में कुछ भी नहीं बचता अर्थात् क्विप् का सर्वापहार लोप हो जाता है। अब प्रश्न होता है कि जब सारे वर्णों का लोप ही करना है तो विधान करने का क्या लाभ हुआ? तो सुनिये, प्रत्ययलक्षणेन धातु कृदन्त बनता है जिससे प्रातिपदिकसंज्ञा हो सकेगी, किंतु होने के कारण सम्प्रसारण होगा, गुण और वृद्धि का निषेध होगा और पित्त्व के कारण तुक् का आगम भी हो सकेगा।

विभ्राट्। चमकने का स्वभाव वाला। भ्राज् दीप्तौ। वि पूर्वक भ्राज् धातु से भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपृजुग्रावस्तुवः क्विप् से क्विप् प्रत्यय करके सर्वापहार लोप करने पर विभ्राज् ही बनता है। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु प्रत्यय, व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराज-भ्राजच्छशां षः से जकार के स्थान पर षकार आदेश, षकार को झलां जशोऽन्ते से जश्त्व होकर डकार को वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व होकर विभ्राट्, विभ्राड् ये दो रूप सिद्ध हो जाते हैं। आगे विभ्राजौ, विभ्राजः, विभ्राजम्, विभ्राजः, विभ्राजा, विभ्राड्भ्याम् आदि रूप बनते हैं।

भाः। चमकने का स्वभाव वाला। भासृ दीप्तौ। भासृ धातु से भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जि-

पृजुग्रावस्तुवः क्विप् से क्विप् प्रत्यय करके सर्वापहार लोप करने पर भासृ ही बनता है।

इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु प्रत्यय, उसका हल्ड्यादिलोप करके पुनः भासृ ही रह

गया। शब्द के ही सकार को रुत्व और विसर्ग होकर भाः सिद्ध होता है। आगे भासौ, भासः,

भासा, भाभ्याम्, भाभिः आदि।