रेफाच्छ्वोर्लोपः क्वौ झलादौ क्डिति। धूः। विद्युत्। ऊर्क्। पूः।
दृशिग्रहणस्यापकर्षाज्जवतेर्दीर्घः। जूः। ग्रावस्तुत्।
वार्तिकम्- क्विब्बचिप्रच्छ्यायतस्तुकटप्रुजुश्रीणां दीर्घोऽसम्प्रसारणञ्च।
वक्तीति वाक्।
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८४२- राल्लोपः। रात् पञ्चम्यन्तं, लोपः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। छ्वोः शूडनुनासिके च से
छ्वोः और अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति से क्विझलोः तथा क्ङिति की अनुवृत्ति आती
है।
रेफ से परे छकार या वकार का लोप होता है, यदि क्वि परे या झलादि
कित्, ङित् परे हो तो।
धूः। चमकने के स्वभाव वाली। धुर्वी हिंसायाम्। धुर्व् धातु से भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जि-
पृजुग्रावस्तुवः क्विप् से क्विप् प्रत्यय करके सर्वापहार लोप करने पर धुर्व् ही बनता है।
प्रत्ययलक्षण से क्विप् को मानकर के राल्लोपः से धुर्व् में विद्यमान अन्त वकार का लोप
हुआ। धुर् बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु प्रत्यय, उसका हल्ड्यादिलोप करके पुनः
धुर् ही रह गया। र्वोरुपधाया दीर्घ इकः से उपधा को दीर्घ करके रेफ को विसर्ग होकर
धूः सिद्ध हुआ है। आगे धुरौ, धुरः, धुरम्, धुरा, धूर्भ्याम् आदि रूप बनते हैं।
विद्युत्। चमकने का स्वभाव वाला। द्युत दीप्तौ। वि पूर्वक द्युत् धातु से
भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जि-पृजुग्रावस्तुवः क्विप् से क्विप् प्रत्यय करके सर्वापहार लोप करने
पर विद्युत् बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु प्रत्यय, उसका हल्ड्यादिलोप करके
विद्युत् सिद्ध हुआ। आगे विद्युतौ, विद्युतः, विद्युता, विद्युद्भ्याम् आदि।
ऊर्क्। बलवान्। ऊर्ज् बलप्राणनयोः। ऊर्ज् धातु से भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपृजुग्रावस्तुवः
क्विप् से क्विप् प्रत्यय करके सर्वापहार लोप करने पर ऊर्ज् बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा
होकर सु प्रत्यय, उसका हल्ड्यादिलोप करके पुनः ऊर्ज् ही रह गया। जकार को चोः कुः
से कुत्व करने पर ऊर्ग् बना। वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करने पर ऊर्क्, ऊर्ग् ये दो रूप
बनते हैं। आगे ऊर्जौ, ऊर्जः, ऊर्जा, ऊर्भ्याम् इत्यादि। यहाँ पर पदान्त क् या ग् का
संयोगान्तलोप नहीं होता, क्योंकि रात्सस्य ने रेफ से परे स् का ही संयोगान्तलोप हो, अन्य
का नहीं, ऐसा नियम किया है।
पूः। प्राणियों के पालन, पोषण करने का स्वभाव वाला। पृ पालनपूरणयोः। पृ धातु
से भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जि-पृजुग्रावस्तुवः क्विप् से क्विप् प्रत्यय करके सर्वापहार लोप
करने पर पृ बना। प्रत्ययलक्षण से क्विप् को कित् मान गुण का निषेध, पृ में ऋकार के
स्थान पर ऋत इद्धातोः से इत्व प्राप्त था, उसे बाध कर के उदोष्ठ्यपूर्वस्य से उत्व, रपर,
होकर पुर् बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु प्रत्यय, उसका हल्ड्यादिलोप करके पुनः
पुर् ही रह गया। र्वोरुपधाया दीर्घ इकः से उपधा को दीर्घ करके रेफ को विसर्ग होकर पूः
सिद्ध होता है। आगे पुरौ, पुरः, पुरम्, पुरा, पूर्भ्याम् आदि रूप बनते हैं।
दृशिग्रहणस्यापकर्षाज्जवतेर्दीर्घः। ग्रन्थकार कहते हैं कि अग्रिम सूत्र अन्येभ्योऽपि
दृश्यते से दृश्यते का अपकर्षण किया जाता है। उसका फल यह माना जायेगा कि इस सूत्र
में कुछ कार्य ऐसे भी हैं, जो लोक में तो देखे जाते हैं किन्तु सूत्र आदि विधान नहीं करते,
उनकी स्वीकृति दृश्यते पद के कारण समझी जाती है। जैसे कि जूः ऐसा प्रयोग लोक में
देखा जाता है किन्तु सूत्रों से कहीं भी दीर्घ नहीं सिद्ध होता। अतः लोक में दृष्ट दीर्घपाठ को स्वीकृत कर लिया जाय, यह तात्पर्य दृश्यते इस पद से लगा लिया जाता है। फलतः गणपाठ में अपठित किन्तु सूत्र में पठित सौत्र धातु जु से भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जि-पृजुग्रावस्तुवः क्विप् से क्विप्, सर्वापहार, उक्त प्रक्रिया से दीर्घ करके जू बन जाता है। अब प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु, उसको रुत्व और विसर्ग करके जूः सिद्ध हो जाता है। आगे जुवौ, जुवः, जुवम् इत्यादि रूप बनते हैं।
ग्रावस्तुत्। पाषाण, मूर्ति आदि अथवा सोम-अभिषव के साधन पत्थर आदि की स्तुति करने के स्वभाव वाला। ग्रावन् पूर्वक ष्टुञ् स्तुतौ धातु है। ग्रावन्+अम्+स्तु से भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जि-पृजुग्रावस्तुवः क्विप् से क्विप् प्रत्यय करके सर्वापहार लोप करने पर ग्रावन्+अम्+स्तु बना। उपपद समास। सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् का लुक्, न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से नकार का लोप, ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् से स्तु को तुक् का आगम कर के ग्रावस्तुत् बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु प्रत्यय, उसका हल्ड्यादिलोप करके ग्रावस्तुत् सिद्ध हुआ। आगे ग्रावस्तुतौ, ग्रावस्तुतः, ग्रावस्तुतम् आदि रूप बनाये जा सकते हैं।
क्विब्वचिप्रच्छ्यायतस्तुकटप्रुजुश्रीणां दीर्घोऽसम्प्रसारणञ्च। यह वार्तिक है। इसका अर्थ है- वच्, प्रच्छ्, आयत पूर्वक स्तु, कट पूर्वक प्रु, जु और श्रि इन छः धातुओं से तच्छील आदि कर्ता अर्थ में क्विप् प्रत्यय होता है साथ ही इन धातुओं को दीर्घ होता है और सम्प्रसारण का अभाव भी।
वाक्। बोलना जिसका स्वभाव है, वाणी। वक्ति तच्छीला। वच् परिभाषणे। वच् से क्विब्वचिप्रच्छ्यायतस्तुकटप्रुजुश्रीणां दीर्घोऽसम्प्रसारणञ्च से क्विप् प्रत्यय और उसके परे रहने पर वचिस्वपियजादीनां किति से प्राप्त सम्प्रसारण का अभाव एवं धातु को दीर्घ आदि करके क्विप् में सर्वापहार लोप करने पर वाच् बना। प्रातिपदिकसंज्ञा के बाद सु, उसका हल्ड्यादिलोप करके चकार को चोः कुः से कुत्व करके वाक् बना। ककार को जश्त्व करके वावसाने से चर्त्व करके वाक्, वाग् ये दो रूप बनते हैं। आगे वाचौ, वाचः, वाचम्, वाचः, वाचा, वाग्भ्याम् इत्यादि।