Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 840
उप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सनाशंसभिक्ष उः
Aṣṭādhyāyī 3.2.168
Vṛtti Varadarājācārya

चिकीर्षुः। आशंसुः। भिक्षुः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८४०- सनाशंसभिक्ष उः। सन् च आशंसश्च भिक्षु च तेषां समाहारद्वन्द्वः सनाशंसभिक्षु, तस्मात्। सनाशंसभिक्षः पञ्चम्यन्तम्, उः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च, का अधिकार और तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु की अनुवृत्ति है।

सन्नन्त, आ+शंस् और भिक्षु धातुओं से तच्छील, तद्धर्म, तत्साधुकारी कर्ता अर्थ में उ प्रत्यय होता है।

प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् के नियम से सन् से सन्नन्त का ग्रहण किया गया है।

चिकीर्षुः। करने की स्वभावतः इच्छा वाला। डुकृञ् करणे। कृ धातु से सन् प्रत्यय करके चिकीर्ष बनता है और उसकी सनाद्यन्ता धातवः धातुसंज्ञा होती है। यह बात सन्नन्तप्रक्रिया में बताई जा चुकी है। चिकीर्ष यह सन्नन्त है। इससे सनाशंसभिक्ष उः से उ प्रत्यय हुआ। उकार की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा करके अतो लोपः से षकारोत्तरवर्ती अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर चिकीर्षु बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु, रुत्वविसर्ग करके चिकीर्षुः सिद्ध हुआ। चिकीर्षु, चिकीर्षवः, चिकीर्षुम्, चिकीर्षून्, चिकीर्षुणा, चिकीर्षुभ्याम्, चिकीर्षुभिः, चिकीर्षवे इत्यादि इसके रूप बनते हैं।

आशंसुः। स्वभावतः इच्छा रखने वाला। आङः शसि इच्छायाम्। आ पूर्वक शस् धातु का इच्छा करना अर्थ है। आ+शंस् से सनाशंसभिक्ष उः से उ प्रत्यय होकर आशंसु

वना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु, रुत्वविसर्ग करके आशंसुः सिद्ध हुआ। आगे आशंसु, आशंसवः, आशंसुम्, आशंसून्, आशंसुना, आशंसुभ्याम् इत्यादि इसके रूप बनते हैं।

भिक्षुः। स्वभावतः भीख मांगने वाला, भीखारी, याचनशील, साधु। भिक्षु भिक्षायाम्। भिक्षु से सनाशंसभिक्षु उः से उ प्रत्यय होकर भिक्षु बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु, रुत्वविसर्ग करके भिक्षुः सिद्ध हुआ। आगे भिक्षु, भिक्षवः, भिक्षुम्, भिक्षून्, भिक्षुणा इत्यादि इसके रूप बनते हैं।