Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 837
तृन्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तृन्
Aṣṭādhyāyī 3.2.135
Vṛtti Varadarājācārya

कर्ता कटान्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८३७- तृन् तृन् प्रथमान्तमेकपदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार और तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु की अनुवृत्ति आती है।

तच्छील, तद्धर्म, तत्साधुकारी कर्ता अर्थ में धातुओं से तृन् प्रत्यय होता है।

नकार इत्संज्ञक है, तृ शेष रहता है। प्रकरण के आरम्भ में तृच् प्रत्यय का प्रसंग आया था। तृन् और तृच् प्रत्ययों की प्रक्रिया एक ही होती है। तृन् में नकार की इत्संज्ञा होने के कारण यह नित् होता है और इसका फल स्वर में अन्तर पड़ता है, रूपसिद्धि में नहीं।

कर्ता कटान्। करोति तच्छीलः। चटाई बनाने का स्वभाव वाला कृ-धातु से ही तृन् सूत्र से तृन् प्रत्यय करके नकार की इत्संज्ञा और लोप करके तृ शेष बचा। तृ की आर्धधातुकसंज्ञा हुई और कृ का सार्वधातुकार्धधातुकयोः से अर्-गुण हुआ, क्+अर्+तृ बना, वर्णसम्मेलन हुआ तो कर्तृ ऐसा ऋकारान्त शब्द बना। कर्तृ की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सु विभक्ति आई। इसके बाद ऋकारान्त धातु-शब्द की तरह ऋकार के स्थान पर ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च से अनङ् आदेश, अनुबन्धलोप, कर्तृ+अन्+स् बना। वर्णसम्मेलन होकर कर्तन् स् बना। त के अकार की अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा से उपधासंज्ञा करके अपृनृच्स्वसृनपृनेष्टृत्वष्टृ- क्षतृहोतृपोतृप्रशास्तृणाम् से दीर्घ हुआ, कर्तान् स् बना। अपृक्त एकाल् प्रत्ययः से सकार की अपृक्तसंज्ञा करके हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से उसका लोप, कर्तान् बना। नकार का नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप, कर्ता सिद्ध हुआ। तृन्नन्त कृदन्त शब्द के योग में कर्तृकर्मणोः कृति से प्राप्त षष्ठी विभक्ति का न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् से निषेध होकर कर्मणि द्वितीया से कट शब्द में द्वितीया विभक्ति हुई- कर्ता कटान्। यह तच्छील कर्ता का उदाहरण है।