Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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Govind
LSK 838
षाकन्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः षाकन्
Aṣṭādhyāyī 3.2.155
Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८३८- जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः षाकन्। जल्पश्च भिक्षश्च कुट्टश्च लुण्टश्च वृङ् च तेषां समाहारद्वन्द्वो जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङ्, तस्मात्। जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः पञ्चम्यन्तं, षाकन् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार और तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु की अनुवृत्ति आती है।

जल्प, भिक्ष, कुट्ट, लुण्ट और वृङ् धातुओं से तच्छील, तद्धर्म, तत्साधुकारी कर्ता अर्थ में षाकन् प्रत्यय होता है।

षाकन् में षकार की अग्रिम सूत्र से इत्संज्ञा होती है और नकार तो हलन्त्यम् से इत्संज्ञक है ही। इस तरह आक शेष रहता है।

जल्पाकः। बहुत बोलने का स्वभाव वाला, बोलने को अपना धर्म समझने वाला अथवा अच्छी तरह से बोलने वाला। यहाँ पर आक्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु में वर्णित तीनों अर्थ घटित होते हैं। जल्प व्यक्तायां वाची। जल्प् धातु से उक्त तीनों अर्थ सहित कर्ता अर्थ में जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः षाकन् से षाकन् प्रत्यय हुआ। ष् की षः प्रत्ययस्य से और न् की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होकर आक शेष बचा। जल्प्+आक बना। वर्णसम्मेलन होकर जल्पाक बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा होकर सु, रुत्वविसर्ग करके जल्पाकः सिद्ध हुआ। कोश आदि के अनुसार जल्पाकः का अर्थ ज्यादा बोलने वाला है।

उक्त पद्धति से उन्हीं अर्थों में भिक्षु आदि धातुओं से भी षाकन् प्रत्यय करके निम्नलिखित शब्द सिद्ध हो सकते हैं-

भिक्षाकः। भीख मांगने का स्वभाव, धर्म अथवा साधुकारिता वाला। भिक्षु भिक्षायामलाभे लाभे च।

कुट्टाकः। छेदन, भर्त्सन का स्वभाव, धर्म अथवा साधुकारिता वाला। कुट्ट छेदनभर्त्सनयोः।

लुण्टाकः। लूटने का स्वभाव, धर्म, साधुकारिता वाला। लुण्ट स्तेये।

वराकः। चुनने, वरण करने का स्वभाव, धर्म अथवा साधुकारिता वाला। वृङ् सम्भक्तौ।

षाकन् प्रत्यय षित् है। इस प्रत्यय के लगने से स्त्रीत्व की विवक्षा में षिद्गौरादिभ्यश्च से ङीष् प्रत्यय होकर जल्पाकी, भिक्षाकी, कुट्टाकी, लुण्टाकी, वराकी आदि रूप बनते हैं।