क्विपमभिव्याप्य वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तच्छीलादिषु कर्तृषु बोध्याः।
८३६- आक्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु। स (धात्वर्थः) शीलं (स्वभावो) यस्य स तच्छीलम्। स (धात्वर्थो) धर्म आचारो यस्य स तद्धर्मा। साधु करोतीति साधुकारी। तस्य साधुकारी तत्साधुकारी। तच्छीलं च तद्धर्मा च तत्साधुकारी च तेषामितरेतरद्वन्द्वस्तच्छीलतद्धर्म-तत्साधुकारिणस्तेषु। आ अव्ययपदं, क्वेः पञ्चम्यन्तं, तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। धातोः का अधिकार होने से यहाँ पर तत् शब्द से धातु का ही बोध होता है।
यहाँ इस सूत्र से लेकर क्विप् प्रत्यय तक कहे जाने वाले सभी प्रत्यय तच्छील, तद्धर्मा और तत्साधुकारी कर्ता अर्थ में होते हैं, ऐसा समझना चाहिए।
उस धातु के अर्थ के स्वभाव वाला तच्छील, उस धातु के अर्थ के धर्म वाला तद्धर्म और उस धातु के अर्थ के अनुसार उत्तम कर्म करने वाला तत्साधुकारी है। अष्टाध्यायी के क्रम से आगे वक्ष्यमाण सूत्र भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपृजुग्रावस्तुवः क्विप् तक के प्रत्ययों के विषय में यह सूत्र अर्थ का निर्णय करता है। इस सूत्र लेकर क्विप् विधायक उक्त सूत्र तक के सभी प्रत्यय उक्त तीन अर्थों में ही होंगे। तात्पर्य यह है कि कर्तरि कृत् से विधीयमान कर्त्रर्थक प्रत्यय के साथ तच्छील, तद्धर्मा और तत्साधुकारी अर्थ भी लगा रहता है।