तौ शतृ-शानचौ सत्संज्ञौ स्तः।
८३४- तौ सत्। तौ प्रथमान्तं, सत् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तौ यह पद लृटः शतृशानचावप्रथमा-समानाधिकरणे से विहित शतृ और शानच् स्वरूपनिर्देश है।
शतृ और शानच् की सत् संज्ञा होती है।
जैसे- निष्ठा कहने से क्त और क्तवतु प्रत्यय का ज्ञान होता है, उसी प्रकार सत् कहने से शतृ और शानच् का ज्ञान होगा। सत्-संज्ञा का उपयोग लृटः सद्वा आदि सूत्रों में किया जायेगा।