Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 833
वस्वादेशविधायकं विधिसूत्रम्
विदेः शतुर्वसुः
Aṣṭādhyāyī 7.1.36
Vṛtti Varadarājācārya

वेत्तेः परस्य शतुर्वसुरादेशो वा। विदन्। विद्वान्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८३३- विदेः शतुर्वसुः। विदेः पञ्चम्यन्तं, शतुः षष्ठ्यन्तं, वसुः प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् से अन्यतरस्याम् की अनुवृत्ति आती है।

विद् धातु से परे शतृ के स्थान पर विकल्प से वसु आदेश होता है।

यह सूत्र केवल विद् धातु में लगता है। वसु में उकार की इत्संज्ञा होती है, वसु शेष रहता है।

विद्वान्। ज्ञाता, जानने वाला। विद् ज्ञाने। विद् धातु से क्वचित् प्रथमासामानाधिकरण्य में भी लृटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे से लृट् के स्थान पर शतृ आदेश हो जाने के बाद शतृ के स्थान पर विदेः शतुर्वसुः से विकल्प से वसु आदेश होकर विद्+वसु बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु, नुम्, दीर्घ, सुलोप आदि करके हलन्तपुँल्लिङ्ग में विद्वान् बना चुके हैं। आगे विद्वांसौ, विद्वांसौ, विदुषः, विदुषा, विद्वद्भ्याम् आदि। जब वसु आदेश नहीं होता, तब शतृ ही है। अनुबन्धलोप के बाद विद्+अत् बना है। शतृ की सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अदादिगणीय धातु होने का कारण उसका लुक् करके विदत् बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके विदन्, विदन्तौ, विदन्तः आदि रूप बनते हैं।