Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 832
मुगागमविधायकं विधिसूत्रम्
आने मुक्
Aṣṭādhyāyī 7.2.82
Vṛtti Varadarājācārya

अदन्ताङ्गस्य मुगागमः स्यादाने परे। पचमानं चैत्रं पश्य। लडित्यनुवर्तमाने

पुनर्लड्ग्रहणात् प्रथमासामानाधिकरण्येऽपि क्वचित्। सन् द्विजः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८३२- आने मुक्। आने सप्तम्यन्तं, मुक् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अतो येयः

से अतः की षष्ठी में विपरिणाम करके अनुवृत्ति आती है और अङ्गस्य का अधिकार है।

आन के परे होने अदन्त अङ्ग को मुक् का आगम होता है।

मुक् में उकार और ककार इत्संज्ञक हैं। कित् होने के कारण अदन्त के अन्त में बैठेगा।

पचमानं चैत्रं पश्य। पच् धातु उभयपदी है, अतः शतृ और शानच् दोनों होते हैं। शतृ का प्रयोग आपने सिद्ध कर ही लिया, अब शानच् का प्रयोग सिद्ध करते हैं। पच् से शानच्, अनुबन्धलोपे, पच्+आन, सार्वधातुकसंज्ञा और शप्, अनुबन्धलोप, पच्+अ+आन बना। पच्+अ=पच, पच्+आन में आने मुक् से पच के अकार को मुक् आगम, अनुबन्धलोप, पच्+म्+आन, बर्णसम्मेलन हुआ, पचमान ऐसा अकारान्त शब्द बना। प्रातिपदिकसंज्ञा करके पुँल्लिङ्ग में राम शब्द की तरह पचमानः और स्त्रीलिङ्ग में टाप् करके पचमाना शब्द बनाकर रमा शब्द की तरह रूप बनते हैं। अब प्रथमा, द्वितीया आदि किसी भी विभक्ति के साथ समानाधिकरण अर्थात् एकविभक्तिक करके प्रयोग करें। पचमानं चैत्रं पश्य। पचमानेन चैत्रेण आनीतम्, पचमानाय चैत्राय देहि आदि। पचमानात् चैत्रादानीतम्, पचमानस्य चैत्रस्य पुस्तकं, पचमाने चैत्रे दयालुता नास्ति।

वेद और लोक में प्रथमान्त के साथ सामानाधिकरण्य में भी शतृ और शानच् प्रत्यय के रूप पर्याप्त मात्रा में देखे जाते हैं किन्तु लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे से प्रथमान्त के साथ समानाधिकरण्य में ये आदेश कतई नहीं हो सकते। प्रथमान्त समानाधिकरण में काव्य और शास्त्रों में प्रयुक्त शतृ-शानच् प्रत्ययान्त शब्दों को भी सीधे असाधु मानना भी उचित नहीं है। सभी लोग प्रथमासमानाधिकरण में ऐसे रूप प्रचुर मात्रा में करते आ रहे हैं। क्या ऐसे शब्दों को असाधु माना जाय? इस पर कौमुदीकार कहते हैं कि लडित्यनुवर्तमाने पुनर्लड्ग्रहणात् प्रथमासमानाधिकरण्येऽपि क्वचित् अर्थात् वर्तमाने लट् से विभक्तिविपरिणाम करके लटः की अनुवृत्ति हो सकती थी तो इस सूत्र में लटः क्यों पढ़ा? पुनः लट् पढ़ने का तात्पर्य यह है कि सर्वथा प्रथमासमानाधिकरण में निषेध नहीं किया गया है। क्योंकि पाणिनि जी ही ऐसा व्यवहार दिखाते हैं। लटः का इस सूत्र में पुनः पठन करना यह संकेत करने के लिए है कि कहीं कहीं प्रथमासमानाधिकरण में भी ये आदेश किये जा सकते हैं। अतः सन् द्विजः आदि प्रथमा के साथ समानाधिकरण वाले प्रयोगों में भी शतृ होता है। अस् धातु से शतृ करने पर शनसोरल्लोपः से अस् के अकार का लोप करके प्रथमा के एक वचन में सन् बनता है। सन् द्विजः। विद्यमान ब्राह्मण। आगे सन्तो ब्राह्मणौ, सन्तो ब्राह्मणाः, सन्तं ब्राह्मणं, सतः ब्राह्मणान्।

अब इसी प्रकार आपने अभी तक जितने धातुओं का अध्ययन किया, उनसे और धातुपाठ में देखकर अन्य प्रचलित धातुओं से भी शतृ और शानच् प्रत्यय लगाकर रूप बनाइये।