Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 831
शतृशानचादेशविधायकं विधिसूत्रम्
लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे
Aṣṭādhyāyī 3.2.124
Vṛtti Varadarājācārya

अप्रथमान्तेन समानाधिकरणे लट एतौ वा स्तः। शबादिः।

पचन्तं चैत्रं पश्य।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८३१- लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे। शता च शानच् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः शतृशानचौ। न प्रथमा अप्रथमा। समानम् अधिकरणं यस्य स समानाधिकरणः। अप्रथमया समानाधिकरणः अप्रथमासमानाधिकरणस्तस्मिन्। लटः षष्ठ्यन्तं, शतृशानचौ प्रथमान्तम्, अप्रथमासमानाधिकरणे सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

अप्रथमान्त अर्थात् द्वितीयान्त आदि के साथ समानाधिकरण होने पर लट् के

स्थान पर शतृ और शानच् आदेश होते हैं।

समानविभक्तिक अर्थात् शतृ-प्रत्ययान्त क्रियाशब्द और कारक की एक ही

विभक्ति में होने की स्थिति हो तो लट् के स्थान पर शतृ और शानच् आदेश होते हैं।

परस्मैपदी धातु से शतृ और आत्मनेपदी से शानच् तथा उभयपदी से दोनों प्रत्यय होते हैं।

शानच् की तडानावात्मनेपदम् से आत्मनेपदसंज्ञा होती है। शित् होने के कारण तिड्शित्

सार्वधातुकम् से शतृ और शानच् की सार्वधातुकसंज्ञा होती है। शतृ में शकार और ऋकार

इत्संज्ञक हैं। अत् शेष रहता है। शित् करण का फल सार्वधातुकसंज्ञा आदि है।। ऋकारेत्संज्ञा

का फल उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः से नुम् आदि करना है। शानच् में शकार और

चकार इत्संज्ञक हैं, आन शेष रहता है। द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी इन

सभी विभक्तियों के साथ एकविभक्तिक होने पर सर्वत्र शतृ, शानच् हो जाते हैं। शतृ की

सार्वधातुकसंज्ञा करके शप् होगा।

पचन्तं चैत्रं पश्य। पकाते हुए चैत्र को देखो। यहाँ पर चैत्रम् द्वितीयान्त होने से

अप्रथमान्त है। चैत्रम् यह पद जिस अर्थ को कहता है, पच् धातु से वर्तमान काल में लाया

गया लट् भी उसी अर्थ को कहता है। अतः अप्रथमान्त के साथ समान अधिकरण है। इस

अवस्था में लट् के स्थान पर शतृ और शानच् हो सकते हैं। यहाँ पर शतृ का उदाहरण

दिखा रहे हैं। पच्+लट् में लट् के स्थान पर लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे से

शतृ आदेश, अनुबन्धलोप, पच्+अत् बना, अत् की सार्वधातुकसंज्ञा करके कर्तरि शप् से

शप्, अनुबन्धलोप, पच्+अ+अत् बना। अ+अत् में अतो गुणे से पररूप पच्+अत्,

वर्णसम्मेलन, पचत्, प्रातिपदिकसंज्ञा, अम् विभक्ति, पचत्+अम् बना। उगिदचां सर्वनामस्थाने

धातोः से नुम्, मित् होने के कारण अन्त्य अच् चकार के अकार के बाद बैठा, पचन्त्+अम्

बना। वर्णसम्मेलन होकर पचन्तम् सिद्ध हुआ। इसके शेष रूप धीमत् शब्द की तरह

पुल्लिङ्ग में पचन्तौ, पचतः, पचता आदि, स्त्रीलिङ्ग में पचन्तीम्, पचन्त्यौ, पचन्त्यः आदि

बनेंगे।

आगे बताया जा रहा है कि कहीं कहीं प्रथमा के साथ समानाधिकरण होने पर

भी ये आदेश होते हैं। अतः इनका प्रयोग प्रथमा, द्वितीया आदि कारक के साथ भी

एकविभक्तिकत्वेन अन्वय होने पर ही होगा। जैसे प्रथमा के साथ समानाधिकरण के उदाहरण

हैं- रामः पठन् गच्छति, द्वितीया का पचन्तं चैत्रं पश्य, तृतीया का पचता चैत्रेण

आनीतम्, चतुर्थी का पचते चैत्राय देहि, पञ्चमी का पचतश्चैत्रादानीतम्, षष्ठी का

पचतश्चैत्रस्य पुस्तकम् और सप्तमी का पचति चैत्रे दयालुता नास्ति आदि।