Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 826
हि-इत्यादेशविधायकं विधिसूत्रम्
दधातेर्हिः
Aṣṭādhyāyī 7.4.42
Vṛtti Varadarājācārya

तादौ किति। हितम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८२६- दधातेर्हिः। दधातेः षष्ठ्यन्तं, हिः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। द्यतिस्यतिमास्थामित्ति किति से ति और किति की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।

तकारादि कित् प्रत्यय के परे होने पर धा धातु के स्थान पर हि आदेश होता है।

यहाँ पर यस्मिन् विधिस्तदादावल्ग्रहणे से तदादिविधि होकर ति से तकारादि अर्थ निकलता है। अनेकाल् होने के कारण अनेकाल्शित् सर्वस्य के नियम से यह सर्वादेश होता है।

हितम्। धारण किया हुआ। डुधाञ् धारणपोषणयोः। यहाँ धा धातु से निष्ठा सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, धा+त बना। अनिद् धातु है। दधातेर्हिः से धा के स्थान पर हि आदेश हुआ- हि+त बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, स्वादि कार्य करके हितम् सिद्ध हुआ। उपसर्गों के योग में इसी से विहितम्, अभिहितम्, निहितम् आदि प्रयोग होते हैं।