स्थूले बलवति च निपात्यते।
८२५- दृढः स्थूलबलयोः। स्थूलञ्च बलञ्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः स्थूलबले, तयोः। दृढः प्रथमान्तं, स्थूलबलयोः सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्।
स्थूल और बलवान् अर्थ में दृढ शब्द का निपातन किया जाता है।
जो कार्य सूत्रों की प्रक्रिया से सिद्ध नहीं हो रहा है, उस कार्य को सूत्रकार स्वयं अपने मन में बनाकर सिद्धकार्य शब्द को कण्ठतः सूत्र में पढ़ देते हैं। इसीको निपातन कहते हैं। अर्थात् शब्द की सिद्धि के लिए प्रक्रिया का अनुसरण न करके यह शब्द शुद्ध है, इस तरह से सीधे कहना ही निपातन है। यहाँ पर दृढ धातु से क्त प्रत्यय करने पर इद् होकर दृहितः ऐसा शब्द बनने जा रहा है। मोटा और बलवान् अर्थ में दृहितः बनना अभीष्ट नहीं है। ऐसा बनने से रोकने के लिए इद् को रोकने वाला निषेधक सूत्र बनाना पड़ता। आचार्य ने सोचा कि एक तो एक विशेष सूत्र बनाना ही पड़ता और दूसरा इसकी पूरी प्रक्रिया करनी पड़ेगी। जैसे कि जब हकार को हो ढः से ढत्व, झषस्तथोर्धोऽधः से निष्ठा के तकार के स्थान पर धत्व, धकार को ष्टुत्व करके दृढ्+ढ में ढो ढे लोपः से पूर्व ढकार का लोप आदि लम्बी प्रक्रिया करनी पड़ती। अतः एक ही सूत्र बना कर के सब काम निपटा लिया जाय। अतः कहा कि मोटा और बलवान् अर्थ में दृढ धातु से क्त प्रत्यय करने पर दृढः बनता है। अर्थात् अन्य अर्थों में इस धातु से दृहितः बन सकता है किन्तु उक्त अर्थ में तो दृढः ही बनेगा।