Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 820
नकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
ओदितश्च
Aṣṭādhyāyī 8.2.45
Vṛtti Varadarājācārya

भुजो भुग्नः। टुओशिव, उच्छूनः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८२०-ओदितश्च। ओत् इत् यस्य स ओदित्, बहुव्रीहिः तस्मात्। ओदितः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः से निष्ठातः और नः की अनुवृत्ति आती है।

ओदित् अर्थात् ओकार इत्संज्ञक धातुओं से परे निष्ठा के तकार के स्थान पर नकार आदेश होता है।

भुग्नः। तोड़ा गया, टेढ़ा किया गया। भुजो कौटिल्ये। भुज् धातु से निष्ठा सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, भुज्+त बना। ओदितश्च से निष्ठा के तकार के स्थान पर नकार आदेश हुआ, भुज्+न बना। ओदितश्च परत्रिपादी सूत्र है, अतः इसके द्वारा किया गया कार्य पूर्वत्रिपादी चोः कुः की दृष्टि में असिद्ध होता है। अतः तकार मानकर के चोः कुः से धातु के जकार को कुत्व करके गकार हुआ- भुग्न बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग करके भुग्नः सिद्ध हुआ। क्तवतु प्रत्यय में भी नत्व होकर भुग्नवान् बनता है।

उच्छूनः। सूजा हुआ, फूला हुआ। टुओश्वि गतिवृद्धयोः। इस धातु में टु की आदिर्ञिटुडवः से और ओ की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा होकर लोप होने के बाद श्वि बचता है। उत् उपसर्ग पूर्वक श्वि धातु से निष्ठा सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, उत्+श्वि+त बना। वचिस्वपियजादीनां किति से वकार को सम्प्रसारण करके आगे पूर्वरूप करने पर उत्+शु+त बना है। अब हलः से सम्प्रसारण रूप उ को दीर्घ होकर उत्+शु+त बना। ओदितश्च से निष्ठा के तकार के स्थान पर नकार आदेश हुआ, उत्+शु+न बना। उपसर्ग के तकार को श्चुत्व और धातु के शकार को शश्छोऽटि से छत्व होकर उच्छून बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग करके उच्छूनः सिद्ध हुआ। क्तवतु प्रत्यय में नत्व होकर उच्छूनवान् बनता है।