Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 821
ककारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
शुषः कः
Aṣṭādhyāyī 8.2.51
Vṛtti Varadarājācārya

निष्ठातस्य कः। शुष्कः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८२१- शुषः कः। शुषः पञ्चम्यन्तं, कः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः से निष्ठातः की अनुवृत्ति आती है।

शुष् धातु से परे निष्ठा के तकार के स्थान पर ककार आदेश होता है।

इस सूत्र में कः को देखकर नः की अनुवृत्ति रूक जाती है अर्थात् नहीं आती है।

शुष्कः। सूखा हुआ। शुष शोषणे। शुष् धातु से निष्ठा सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, शुष्+त बना। अब ष्टुना ष्टुः से ष्टुत्व और शुषः कः से निष्ठा के तकार के स्थान पर ककार आदेश एक साथ प्राप्त हुए किन्तु पूर्वत्रासिद्धम् के नियम से शुषः कः इस पूर्वत्रिपादी के प्रति ष्टुना ष्टुः यह परत्रिपादी असिद्ध हुआ। अतः शुषः कः से तकार के स्थान पर ककार आदेश हुआ, शुष्+क, वर्णसम्मेलन होकर शुष्क बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग करके शुष्कः सिद्ध हुआ। क्तवतु प्रत्यय में कत्व होकर शुष्कवान् बनता है।