Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
Show
VṛttiGovind
LSK 819
दीर्घविधायकं विधिसूत्रम्
हलः
Aṣṭādhyāyī 6.4.2
Vṛtti Varadarājācārya

अङ्गावयवाद्धलः परं यत्सम्प्रसारणं तदन्तस्य दीर्घः। जीनः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८१९- हलः। हलः पञ्चम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। सम्प्रसारणस्य से सम्प्रसारणस्य और ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से दीर्घः की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।

अङ्ग के अवयव हल् से परे जो सम्प्रसारण, तदन्त जो अङ्ग, उसको दीर्घ होता है।

अचश्च और अलोऽन्त्यस्य इन दो परिभाषासूत्रों की सहायता से अन्त्य अच् को ही दीर्घ हो सकता है। सम्प्रसारणस्य यह अङ्गस्य का विशेषण है, अतः सम्प्रसारणान्तस्य यह अर्थ हुआ है।

जीनः। बूढ़ा हुआ। ज्या वयोहानौ। ज्या इस आकारान्त धातु से निष्ठा सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, ज्या+त बना। ग्रहिज्यावयविव्यधिविष्टिविचतिवृश्चति-पृच्छतिभृज्जतीनां डिति च से यकार को सम्प्रसारण करके ज्+इ+आ+त बना है। इ+आ में सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप होकर इ मात्र बना। उसके बाद हलः से सम्प्रसारण रूप जि के

इकार को दीर्घ हुआ। जी+त बना। दकार से परे निष्ठासंज्ञक तकार नहीं है, अतः नत्व के लिए सूत्र लगा- ल्वादिभ्यः। इससे तकार के स्थान पर नकार आदेश हुआ, जी+न बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग, जीनः। क्तवतु प्रत्यय में भी नत्व होकर जीनवान् बनता है।