Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 818
नकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
ल्वादिभ्यः
Aṣṭādhyāyī 8.2.44
Vṛtti Varadarājācārya

एकविंशतेर्लूजादिभ्यः प्राग्वत्।

लूनः। ज्या धातुः। ग्रहिज्येति सम्प्रसारणम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८१८- ल्वादिभ्यः। लू आदिर्येषां ते ल्वादयस्तेभ्यः। ल्वादिभ्यः पञ्चम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः से निष्ठातः और नः की अनुवृत्ति आती है।

लूञ् आदि इक्कीस धातुओं से परे निष्ठा के तकार के स्थान पर नकार आदेश होता है।

लूनः। काटा हुआ। लूञ् छेदने। लू धातु से निष्ठा सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, लू+त बना। दकार से परे निष्ठासंज्ञक तकार नहीं है, अतः नत्व के लिए सूत्र लगा- ल्वादिभ्यः। इससे तकार के स्थान पर नकार आदेश हुआ, लू+न बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग, लूनः। क्तवतु प्रत्यय में भी नत्व होकर लूनवान् बनता है।