Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 817
नकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः
Aṣṭādhyāyī 8.2.43
Vṛtti Varadarājācārya

निष्ठातस्य नः स्यात्। द्राणः। ग्लानः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८१७-संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः। संयोगः आदिर्यस्य सः संयोगादिस्तस्य। यण् अस्मिन्नस्तीति यण्वान्, तस्य। रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः से निष्ठातः और नः की अनुवृत्ति आती है।

संयोग जिस के आदि में हो ऐसे आकारान्त यण् वाले धातु से परे निष्ठा के तकार के स्थान पर नकार आदेश होता है।

यह सूत्र रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः का समानान्तर सूत्र है। इस सूत्र की प्रवृत्ति में तीन हेतु होने चाहिए- धातु के आदि में संयोग हो, धातु में यण् अर्थात् य, व, र, ल् में से कोई एक वर्ण हो और वह धातु आकारान्त हो। ऐसे में निष्ठासंज्ञक तकार के स्थान पर नकार हो जाता है।

द्राणः। दुर्गति को प्राप्त। द्रा कुत्सायां गतौ। द्रा धातु से निष्ठा सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, द्रा+त बना। दकार, रकार से परे निष्ठासंज्ञक तकार नहीं है, अतः नत्व के लिए दूसरा सूत्र लगा- संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः। यहाँ पर द्रा धातु द् और र के संयोग होने से संयोगादि वाला भी है और रेफयुक्त होने के कारण यण्वान् भी है तथा आकारान्त भी। अतः निष्ठा के तकार के स्थान पर नकार आदेश हुआ, द्रा+न बना। अट्कुष्वाङ्नुम्ब्यवायेऽपि से नकार को णत्व करके, प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग, द्राणः। क्तवतु प्रत्यय में यही प्रक्रिया होकर द्राणवान् बनता है।

ग्लानः। खिन्न, दुःखी। ग्लै हर्षक्षये। ग्लै इस ऐकारान्त धातु से निष्ठासंज्ञक प्रत्यय

की विवक्षा में आदेच उपदेशेऽशिति से ऐकार के स्थान पर आकार आदेश करके ग्ला बना है। उससे निष्ठा के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, ग्ला+त बना। दकार से परे निष्ठासंज्ञक तकार नहीं है, अतः नत्व के लिए सूत्र लगा- संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः। यहाँ पर ग्ला धातु संयोगादि वाला भी है, यण्वान् है और आकारान्त भी। अतः निष्ठा के तकार के स्थान पर नकार आदेश हुआ, ग्ला+न बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग, ग्लानः। क्तवतु प्रत्यय में यही प्रक्रिया होकर ग्लानवान् बनता है।