Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 816
नकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः
Aṣṭādhyāyī 8.2.42
Vṛtti Varadarājācārya

रदाभ्यां परस्य निष्ठातस्य नः स्यात्, निष्ठापेक्षया पूर्वस्य धातोर्दस्य च।

शृ हिंसायाम्। ऋत इत्। रपरः। णत्वम्। शीर्णः। भिन्नः। छिन्नः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८१६- रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः। रश्च दश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो रदौ, ताभ्याम्। निष्ठायाः त् निष्ठात्, तस्य निष्ठातः, षष्ठीतत्पुरुषः। रदाभ्यां पञ्चम्यन्तं, निष्ठातः षष्ठ्यन्तं, नः प्रथमान्तं, पूर्वस्य षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं दः षष्ठ्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्।

रेफ या दकार से परे निष्ठा के तकार को नकार आदेश होता और निष्ठा की अपेक्षा पूर्व में स्थित धातु के दकार को भी नकार आदेश होता है।

यह सूत्र रेफ या दकार से क्त-प्रत्यय के तकार के परे रहने पर लगता है, प्रत्यय के तकार के स्थान पर भी नकार करता है और यदि धातु के अन्त में दकार हो तो उसके स्थान पर भी नकार आदेश करता है।

शीर्णः। हिंसा किया गया, मारा गया। शृ हिंसायाम् धातु है। शृ धातु से निष्ठा

इस सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, शृ+त बना। क्त के कित् होने के कारण प्राप्त गुण का निषेध, ऋत इद्धातोः से धातु में विद्यमान दीर्घ ऋकार के स्थान पर रपर सहित इकार आदेश होने पर शिर्+त बना। हलि च से रेफान्त उपधा को दीर्घ करके शीर्+त बना। रकार से परे निष्ठासंज्ञक तकार के स्थान पर रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः से नकार आदेश हुआ, शीर्+न बना। रषाभ्यां नो णः समानपदे से नकार को णत्व करके रेफ का ऊर्ध्वगमन होकर शीर्ण बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग करके शीर्णः सिद्ध हुआ। क्तवतु प्रत्यय में यही प्रक्रिया होती है अर्थात् नत्व होकर शीर्णवान् बनता है।

छिन्नः। काटा गया। छिदिर् द्वैधीकरणे। छिद् धातु से निष्ठा सूत्र के द्वारा क्त प्रत्यय, ककार का लोप, छिद्+त बना। दकार से परे निष्ठासंज्ञक तकार और धातु के दकार दोनों के स्थान पर रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः से नकार आदेश हुआ, छिन्+न बना, वर्णसम्मेलन, छिन्न। प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग, छिन्नः। क्तवतु प्रत्यय में यही प्रक्रिया होकर छिन्नवान् बनता है।

भिन्नः। तोड़ा गया। भिदिर् विदारणे। भिद् धातु से निष्ठा से क्त प्रत्यय, ककार का लोप, भिद्+त बना। दकार से परे निष्ठासंज्ञक तकार है, अतः धातु के दकार और प्रत्यय के तकार दोनों के स्थान पर रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः से नकार आदेश हुआ, भिन्+न बना, वर्णसम्मेलन, भिन्न। प्रातिपदिकसंज्ञा, रुत्वविसर्ग, भिन्नः। क्तवतु प्रत्यय में यही प्रक्रिया होती है अर्थात् नत्व होकर भिन्नवान् बनता है।