Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 815
निष्ठाप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
निष्ठा
Aṣṭādhyāyī 3.2.102
Vṛtti Varadarājācārya

भूतार्थवृत्तोर्धातोर्निष्ठा स्यात्।

तत्र तयोरेवेति भावकर्मणोः क्तः, कर्तरि कृदिति कर्तरि क्तवतुः।

उकावितौ। स्नातं मया। स्तुतस्त्वया विष्णुः। विश्वं कृतवान् विष्णुः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८१५- निष्ठा। निष्ठा प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। कृदन्तप्रकरण के सूत्रों में धातोः, प्रत्ययः, परश्च इन तीन सूत्रों का अधिकार तो होता ही है, साथ ही इस सूत्र में भूते का भी अधिकार है।

निष्ठासंज्ञक क्त और क्तवतु प्रत्यय भूतकाल अर्थ में सभी धातुओं से होते हैं।

तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः के नियमानुसार क्त प्रत्यय भाव और कर्म अर्थ में तथा कर्तरि कृत् के नियमानुसार क्तवतु प्रत्यय कर्ता अर्थ में होता है। भाव और कर्म अर्थ में क्त प्रत्यय होने से इसका कर्ता तृतीयान्त होगा किन्तु क्तवतु प्रत्यय कर्ता में होने से इसका कर्ता प्रथमान्त होगा।

स्नातं मया। मुझसे नहाया गया। ष्णा शौचे। धात्वादेः षः सः से षकार को सत्व करने पर ण भी न में बदल गया। स्ना से निष्ठा सूत्र के द्वारा भाव और भूतकाल अर्थ में क्त, अनुबन्धलोप, स्नात, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अमादेश, पूर्वरूप स्नातम् बना। नपुंसकलिङ्ग और औत्सर्गिक एकवचन हुआ। इसका कर्ता अस्मद्-शब्द तृतीयान्त बना- स्नातं मया।

स्तुतस्त्वया विष्णुः। तुझ से विष्णु की स्तुति की गई अर्थात् तुमने विष्णु की स्तुति की। ष्टुञ् स्तुतौ। धात्वादेः षः सः। षकार के अभाव में टकार भी तकार में बदल गया। स्तु-धातु से कर्म और भूतकाल अर्थ में क्त प्रत्यय, अनुबन्धलोप, कित् होने के कारण सार्वधातुकार्यधातुकयोः से प्राप्त गुण का विडन्ति च से निषेध, स्तुत की प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, रुत्वविसर्ग, स्तुतः सिद्ध हुआ। यहाँ कर्ता युष्मत्-शब्द तृतीयान्त ही हुआ किन्तु कर्म में प्रत्यय होने के कारण कर्म जिस लिङ्ग, विभक्ति और वचन का होता है, क्रिया भी उसी लिङ्ग, विभक्ति और वचन का होगा। यहाँ पर विष्णु शब्द पुँल्लिङ्ग, प्रथमा, एकवचन का है, इसलिए स्तुतः भी पुँल्लिङ्ग, प्रथमा, एकवचन का ही हुआ- स्तुतः त्वया विष्णुः। स्तुतः के विसर्ग को विसर्जनीयस्य सः से सकार आदेश होकर स्तुतस्त्वया विष्णुः बन गया। अकारान्त स्तुत के पुँल्लिङ्ग में रामशब्द की तरह स्तुतः, स्तुतौ, स्तुताः, स्त्रीलिङ्ग में टाप् आदि होकर रमा शब्द की तरह स्तुता, स्तुते, स्तुताः और नपुंसकलिङ्ग में ज्ञानशब्द की तरह स्तुतम्, स्तुते, स्तुतानि आदि रूप बनते हैं।

विश्वं कृतवान् विष्णुः। विष्णु ने विश्व को बनाया। ( डुकृञ् करणे ) कृ-धातु से कर्ता अर्थ में निष्ठासंज्ञक क्तवतु प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तवत् बचा। कित् होने से गुण का

निषेध, कृतवत् हलन्त शब्द बना। प्रातिपदिकसंज्ञा सु, कृतवत्+स् में धीमत् शब्द की तरह उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः से अन्य अच् के बाद नुम् आगम, अनुबन्धलोप, कृतवन्त्+स् बना। अत्वसन्तस्य चाधातोः से वकारोत्तरवर्ती अकार को दीर्घ, कृतवान्त् स् बना। सकार का हल्ङ्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप, तकार का संयोगान्तस्य लोपः से लोप करने पर कृतवान् सिद्ध हुआ। इसके रूप धीमत् की तरह ही चलते हैं।

विभक्ति

एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

कृतवान्

कृतवन्तौ

कृतवन्तः

द्वितीया

कृतवन्तम्

कृतवन्तौ

कृतवतः

तृतीया

कृतवता

कृतवद्भ्याम्

कृतवद्भिः

चतुर्थी

कृतवते

कृतवद्भ्याम्

कृतवद्भ्यः

पञ्चमी

कृतवतः

कृतवद्भ्याम्

कृतवद्भ्यः

षष्ठी

कृतवतः

कृतवतोः

कृतवताम्

सप्तमी

कृतवति

कृतवतोः

कृतवत्सु

सम्बोधन

हे कृतवन्!

हे कृतवन्तौ!

हे कृतवन्तः!

स्त्रीलिङ्ग में उगितश्च से ङीप् करके कृतवती बनता है और इसके रूप नदी-शब्द की तरह कृतवती, कृतवत्यौ, कृतवत्यः आदि बनते हैं। नपुंसकलिङ्ग में तान्त ही रहेगा और रूप बनेंगे- कृतवत्, कृतवती, कृतवन्ति, कृतवत्, कृतवती, कृतवन्ति और तृतीया से पुँल्लिङ्ग की तरह ही रूप बन जाते हैं।

अब आप अन्य धातुओं से भी क्त और क्तवतु प्रत्यय करके रूप बनाइये। जैसे- लिख् से लिखितम्, लिखितः, लिखितवान्। पठ् से पठितम्, पठितः, पठितवान्। चल् से चलितम्, चलितः, चलितवान्। गम् से गतम्, गतः, गतवान्। (गम् धातु में अनुनासिक मकार का अनुदात्तोपदेश० सूत्र से लोप होता है।) हस् से हसितम्, हसितः, हसितवान् इत्यादि।