Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 812
अलुग्विधायकं विधिसूत्रम्
तत्पुरुषे कृति बहुलम्
Aṣṭādhyāyī 6.3.14
Vṛtti Varadarājācārya

डेरलुक्। सरसिजम्, सरोजम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८१२- तत्पुरुषे कृति बहुलम्। तत्पुरुषे सप्तम्यन्तं, कृति सप्तम्यन्तं, बहुलम् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। हलदन्तात् सप्तम्याः संज्ञायाम् से सप्तम्याः और अलुगुत्तरपदे सम्पूर्ण सूत्र की अनुवृत्ति आती है।

तत्पुरुष समास में कृदन्त उत्तरपद के परे होने पर सप्तमी का बहुल से अलुक् होता है।

यह सूत्र अलुक् समास का है। समास होने पर जो सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से प्रातिपदिक के अवयव सुप् का लुक् प्राप्त होता है, उसका यह निषेध करता है। यदि तत्पुरुष समास हुआ हो और कृदन्त उत्तरपद में हो एवं पूर्वपद में सप्तमी विभक्ति हो तो उसका लुक् न हो। यह विधि बहुल से होती है। बहुल का तात्पर्य- कहीं होना, कहीं न होना, कहीं विकल्प से होना और कहीं कुछ भिन्न ही होना। आप कृत्यप्रक्रिया के कृत्यलुटो बहुलम् सूत्र में बहुल को भलीभाँति समझ चुके हैं। इस सूत्र में उत्तरपदे की अनुवृत्ति आने से वह कृति का विशेषण बन जाता है। फलतः कृदन्ते यह अर्थ निकलता है।

सरसिजम्, सरोजम्। तालाब में पैदा हुआ, कमल। सरसि जातम्। यहाँ पर

भूतकाल है और सरस्+डि इस सप्तम्यन्त के उपपद होने पर जन् ( जनी प्रादुर्भावे ) धातु से सप्तम्यां जनेर्डः से ड प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके सरस्+डि+जन्+अ बना। डित् होने के कारण भसंज्ञा के न रहने पर भी जन् में जो टिसंज्ञक अन् है, उसका लोप हुआ और जकार प्रत्यय के अकार से मिल गया- सरस्+डि+ज बना। पूर्वपद में विद्यमान सप्तमी विभक्ति का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् प्राप्त था। तत्पुरुषे कृति बहुलम् से अलुक् अर्थात् लुक् का निषेध हुआ। यहाँ पर बहुल का अर्थ विकल्प लिया गया। अतः सप्तमी का विकल्प से अलुक् हुआ। सरसिज यह प्रातिपदिक सिद्ध हुआ। इससे सु आदि विभक्ति लगाकर सरसिजम्, सरसिजे, सरसिजानि आदि रूप बनते हैं। जब सप्तमी का अलुक् नहीं हुआ अर्थात् लुक् हो गया तो सरस्+ज बनता है। इसमें सरस् पद है ही, अतः पदान्त सकार को रुत्व करके हशि च से उत्व करके सर+उ+ज बना। गुण होकर सरोज बना। स्वादि कार्य करके सरोजम्, सरोजे, सरोजानि आदि बनाते जायें। इसी तरह मनसि जातं मनसिजम्, मनोजम् मन में उत्पन्न होने वाला कामदेव, वने जातं वनजम् आदि अनेक शब्दों की सिद्धि की जाती है।