प्रजा स्यात् सन्ततौ जने॥
८१३- उपसर्गे च संज्ञायाम्। उपसर्गे सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, संज्ञायां सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। भूते, धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है। सप्तम्यां जनेर्डः से जनेः और डः की अनुवृत्ति आती है।
उपसर्ग उपपद होने पर भूतकाल में जन् धातु से ड प्रत्यय होता है संज्ञा के विषय में।
इस सूत्र के लिए उपसर्ग उपपद में होना चाहिए, जन् धातु होना चाहिए और प्रकृति और प्रत्यय से समुदायार्थ संज्ञा होनी चाहिए।
प्रजा। प्रजायत इति। जो उत्पन्न हुई है, जनता, सन्तति आदि। प्र पूर्वक जन् धातु है। संज्ञा अर्थ भी है। अतः उपसर्गे च संज्ञायाम् से प्र+जन् से ड प्रत्यय, अनुबन्धलोप, टिसंज्ञक अन् का लोप करके प्रज्+अ= प्रज बना। यहाँ पर कुगतिप्रादयः से गतिसमास होता है। संज्ञा में प्रजा ऐसा स्त्रीप्रत्ययान्त शब्द प्रयुक्त होता है। अतः अजाद्यतष्टाप् से टाप् प्रत्यय होकर प्रजा शब्द बना। इससे रमा शब्द की तरह प्रजा, प्रजे, प्रजाः आदि सुबन्त रूप बनते हैं।