Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
Show
VṛttiGovind
LSK 810
क्वनिप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सहे च
Aṣṭādhyāyī 3.2.96
Vṛtti Varadarājācārya

कर्मणीति निवृत्तम्। सह योधितवान् सहयुध्वा। सहकृत्वा।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८१०- सहे च। सहे सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। भूते, धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है तथा दृशोः क्वनिप् से क्वनिप् और राजनि युधि कृञः से युधि कृञ् की अनुवृत्ति आती है।

सह के उपपद होने पर भूतकालिक क्रिया में वर्तमान युध् और कृञ् धातुओं से क्वनिप् प्रत्यय होता है।

कर्मणि की अनुवृत्ति यहाँ पर नहीं आती। अतः कौमुदीकार ने लिखा- कर्मणीति निवृत्तम्। सह वैसे भी अव्यय है। अतः सह यह कर्म नहीं हो सकता। अर्थात् सह इस पद को देखते हुए कर्मणि स्वतः निवृत्त हुआ।

सहयुध्वा। सह योधितवान्। किसी के साथ युद्ध कर चुका व्यक्ति। यहाँ पर भूतकाल है और सह यह उपपद है। युध् धातु से क्वनिप्, अनुबन्धलोप करके सहयुध्वन् यह प्रातिपदिक सिद्ध हुआ। इससे सु आदि विभक्ति लगाकर राजयुध्वन् की तरह सहयुध्वा, सहयुध्वानौ, सहयुध्वानः आदि रूप बनते हैं।