क्वनिप् स्यात्। युधिरन्तर्भावितण्यर्थः। राजानं योधितवान् राजयुध्वा। राजकृत्वा।
८०९- राजनि युधि कृञः। राजनि सप्तम्यन्तं, युधि सप्तम्यन्तं, कृञः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। भूते तथा धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है और कर्मणि हनः से कर्मणि तथा दृशोः क्वनिप् से क्वनिप् की अनुवृत्ति आती है।
राजन् इस कर्म के उपपद होने पर भूतकालिक क्रिया में वर्तमान युध् और कृञ् धातुओं से क्वनिप् प्रत्यय होता है।
कर्तरि कृत् के अनुसार यह प्रत्यय भी कर्ता अर्थ में ही होता है किन्तु उपपदसंज्ञक जो कर्म है वह राजन् ऐसा ही होना चाहिए। अनुबन्धलोप होकर वन् शेष रहता है। कौमुदीकार लिखते हैं कि यहाँ पर युध् धातु अन्तर्भावितण्यर्थ है अर्थात् धातु में ही णिच् का अर्थ विद्यमान है। अतः युद्ध क्रिया ऐसा अर्थ न होकर युद्ध कराया ऐसा अर्थ होगा।
राजयुध्वा। राजानं योधितवान् । राजा को लड़ाया जिसने। यहाँ पर भूतकाल है और राजन् यह कर्म उपपद है। युध् धातु से क्वनिप्, अनुबन्धलोप, कृत् के योग में कर्म में षष्ठी, उपपदसमास करके सुप् का लुक् करके राजयुध्वन् यह प्रातिपदिक सिद्ध हुआ। इससे सु आदि विभक्ति लगाकर राजयुध्वा, राजयुध्वानौ, राजयुध्वानः आदि रूप बनते हैं।
राजकृत्वा। राजानं कृतवान् । राजा को बनाया जिसने। यहाँ पर भूतकाल है और राजन् यह कर्म उपपद है। कृ धातु से क्वनिप्, अनुबन्धलोप, कृत् के योग में कर्म में षष्ठी, उपपदसमास करके सुप् का लुक् करके राजकृत्वन् बना। ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् से तुक् आगम करके राजकृत्वन् यह प्रातिपदिक सिद्ध हुआ। इससे सु आदि विभक्ति लगाकर राजकृत्वा, राजकृत्वानौ, राजकृत्वानः आदि रूप बनते हैं।