Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 806
ह्रस्वविधायकं विधिसूत्रम्
खित्यनव्ययस्य
Aṣṭādhyāyī 6.3.66
Vṛtti Varadarājācārya

खिदन्ते परे पूर्वपदस्य ह्रस्वः। ततो मुम्। कालिम्मन्या।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८०६-खित्यनव्ययस्य। ख् इत् यस्य स खित्, तस्मिन्। न अव्ययम् अनव्ययं, तस्य। खिति सप्तम्यन्तम्, अनव्ययस्य षष्ठ्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अलुगुत्तरपदे से उत्तरपदे का अधिकार है। इको ह्रस्वोऽङ्यो गालवस्य से ह्रस्वः की अनुवृत्ति आती है। उत्तरपदे से पूर्वपद का आक्षेप किया जाता है।

खित् प्रत्यय जिसके अन्त में हो, ऐसे उत्तरपद के परे रहने पर पूर्वपद के अन्त्य वर्ण को ह्रस्व होता है, अनव्यय में अर्थात् अव्यय को ह्रस्व नहीं होता।

पूर्वपद को प्राप्त ह्रस्व अलोऽन्त्यस्य की सहायता से अन्त्य वर्ण को हो जाता है।

कालिम्मन्या। आत्मानं कालीं मन्यते। अपने को काली, दुर्गा मानने वाली, स्त्री। यहाँ पर मन् धातु की कर्त्री अपने आप को काली मान रही है, अतः मन् धातु आत्ममाने अर्थ में प्रयुक्त है। काली कर्म के उपपद रहते मन ज्ञाने इस दिवादिगणीय धातु से खश् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, कृत् के योग में षष्ठी आती है, काली ङस्+मन्+अ बना। खश् के शित् होने से उसकी सार्वधातुकसंज्ञा करके कर्तरि शप् से शप् प्राप्त था, दिवादि धातु होने

के कारण उसे बाधकर के दिवादिभ्यः श्यन् से श्यन् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप करने पर य बचा। मन्+य+अ में अतो गुणे से पररूप होकर मन्य बनता है। उपपदमतिङ् से उपपदसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, प्रातिपदिक के अवयव का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् करने पर काली+मन्य बना है। खित्यनव्ययस्य से खिदन्त के परे काली के ईकार को ह्रस्व करके कालि+मन्य बना। अब अरुद्विषदजन्तस्य मुम् से खित् के परे रहने पर मुम् का आगम करके, उसको अनुस्वार और परसवर्ण करके कालिमन्य ऐसा अदन्त शब्द तैयार हो गया है। स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् होकर कालिमन्या बन जाता है। अब आगे स्वादिकार्य करके कालिमन्या, कालिमन्ये, कालिमन्याः आदि रूप बनाये जाते हैं। इसी तरह आत्मानं सुन्दरीं मन्यते- सुन्दरिमन्या, सतिमन्या आदि भी बनाये जा सकते हैं।