स्वकर्मके मनने वर्तमानान्मन्यतेः सुपि खश् स्याच्चाणिनिः।
पण्डितमात्मानं मन्यते पण्डितमन्यः। पण्डितमानी।
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८०५- आत्ममाने खश्च। मननं मानः, आत्मनः=स्वस्य मान आत्ममानः, तस्मिन्। आत्ममाने
सप्तम्यन्तं, खः प्रथमान्त, च अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये से सुपि,
णिनिः और मनः से मनः की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है
ही।
यदि मन् धातु का कर्ता उसका कर्म भी हो अर्थात् अपने को मानता है,
ऐसा अर्थ हो तो सुबन्त के उपपद होने पर मन् धातु से खश् और णिनि प्रत्यय होते
हैं।
सूत्र में चकार पढ़ा गया है, अतः णिनि का समुच्चय है। खश् में खकार की
लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा होती है और शकार भी हलन्त्यम् से इत्संज्ञक है ही। अतः अ शेष रहता है। खित् का प्रयोजन मुम् आगम और शित् का प्रयोजन सार्वधातुकसंज्ञा करना है। इस सूत्र से अपने को मानना अर्थ में ही ये प्रत्यय किये जाते हैं।
पण्डितम्मन्यः, पण्डितमानी। आत्मानं पण्डितं मन्यते। अपने को पण्डित मानने वाला। यहाँ पर मन् धातु का कर्ता अपने आप को पण्डित मान रहा है, अतः मन् धातु आत्ममाने अर्थ में प्रयुक्त है। पण्डित कर्म के उपपद रहते मन ज्ञाने इस दिवादिगणीय धातु से खश् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, कृत् के योग में षष्ठी आती है, पण्डित ङस्+मन्+अ बना। है। खश् के शित् होने से उसकी सार्वधातुकसंज्ञा करके कर्तरि शप् से शप् प्राप्त था, दिवादि धातु होने के कारण उसे बाधकर के दिवादिभ्यः श्यन् से श्यन् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप करने पर य बचा। मन्+य+अ में अतो गुणे से पररूप होकर मन्य बनता है। उपपदमतिङ् से उपपदसमास करके प्रातिपदिकसंज्ञा, प्रातिपदिक के अवयव का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् करने पर पण्डित+मन्य बना है। अरुर्द्विषदजन्तस्य मुम् से खित् के परे रहने पर मुम् का आगम करके, उसको अनुस्वार और परसवर्ण करके पण्डितम्मन्य ऐसा अदन्त शब्द तैयार हो गया है। अब आगे स्वादिकार्य करके पण्डितम्मन्यः, पण्डितम्मन्यौ, पण्डितम्मन्याः आदि रूप बनाये जाते हैं। खश् के साथ णिनि प्रत्यय का समुच्चय है। अतः णिनि होने के पक्ष में शित् के न होने के कारण श्यन् आदि नहीं होंगे। खित् न होने के कारण मुम् आगम भी नहीं होगा। इस तरह पण्डितमानिन् प्रातिपदिक बनेगा। इसके रूप दर्शनीयमानिन् की तरह ही पण्डितमानी, पण्डितमानिनौ, पण्डितमानिनः आदि बना सकते हैं। इसी तरह आत्मानं शूरं मन्यते- शूरम्मन्यः-शूरमानी, वीरम्मन्यः-वीरमानी, धन्यम्मन्यः-धन्यमानी, ईश्वरम्मन्यः-ईश्वरमानी, विद्वन्मन्यः-विद्वन्मानी आदि बनाने का प्रयत्न करे।