करणे उपपदे भूतार्थे यजेर्णिनिः कर्तरि।
सोमेनेष्टवान् सोमयाजी। अग्निष्टोमयाजी।
८०७- करणे यजः। करणे सप्तम्यन्तं, यजः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। भूते, धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है। सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये से णिनि की अनुवृत्ति आती है।
करण के उपपद होने पर भूतकाल की क्रिया के वाचक यज् धातु से कर्ता अर्थ में णिनि प्रत्यय होता है।
सोमयाजी। सोमेन इष्टवान्। सोमलता से यज्ञ कर चुका व्यक्ति। यहाँ पर यज्ञ करने में सोम यह करण है और भूतकाल में करणे यजः से यज् धातु से णिनि करके सोमयाजी, सोमयाजिनौ, सोमयाजिनः आदि बना सकते हैं। ध्यान रहे कि जहाँ जहाँ पर उपपद के रहने पर प्रत्यय होते हैं, वहाँ-वहाँ उपपद का धातु के साथ उपपदसमास अवश्य होता है, यह नहीं भूलना चाहिए। कृत् प्रत्यय के लगने के बाद तो कृदन्त मानकर के प्रातिपदिक संज्ञा होती ही है। उसके बाद सु आदि प्रत्ययों के विना तो पद ही नहीं बनता और पद के विना प्रयोग ही नहीं किया जा सकता। पाठकों को स्मरण कराते हैं कि व्याख्या में यदि कहीं कहीं उन सारी प्रक्रियाओं को नहीं दिखा सके तो भी आप समझ लें कि समास, स्वादिकार्य आदि सभी होते हैं।
अग्निष्टोमयाजी। अग्निष्टोमेन इष्टवान्। अग्निष्टोम यज्ञ कर चुका व्यक्ति। यहाँ पर यज्ञ करने में अग्निष्टोम यह करण है और भूतकाल में करणे यजः से यज् धातु से णिनि करके अग्निष्टोमयाजी, अग्निष्टोमयाजिनौ, अग्निष्टोमयाजिनः आदि बना सकते हैं।