Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 804
णिनिप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
मनः
Aṣṭādhyāyī 3.2.82
Vṛtti Varadarājācārya

सुपि मन्यतेर्णिनिः स्यात्। दर्शनीयमानी।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८०४- मनः। मनः पञ्चम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। सुप्यजातौ णिनिः से सुपि और णिनिः की

अनुवृत्ति आती है तथा धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

सुबन्त के उपपद होने पर मन् धातु से णिनि प्रत्यय होता है।

अनुबन्धलोप होकर इन् बचता है। अपने को मानना अर्थ में अग्रिम सूत्र

आत्ममाने खश्च लगता है। अतः इस सूत्र से अपने को मानने अर्थ में नहीं अपि तु

सामान्यतया मानना, जानना अर्थ में णिनि किया जाता है।

दर्शनीयमानी। दर्शनीयं मन्यते। सुन्दर, दर्शनीय मानने वाला। दर्शनीय कर्म के

उपपद रहते मन ज्ञाने इस दिवादिगणीय धातु से णिनि प्रत्यय, अनुबन्धलोप, णित् होने के

कारण मन् के उपधा की अत उपधायाः से वृद्धि होती है। उपपद दर्शनीय से कृत् के योग

में षष्ठी विभक्ति, उपपदसमास, विभक्ति का लुक् करके दर्शनीयमानिन् बना। इससे सु

आदि विभक्ति के योजन से रूप बनते हैं-

दर्शनीयमानी,

दर्शनीयमानिनौ,

दर्शनीयमानिनः,

दर्शनीयमानिनम्,

दर्शनीयमानिनौ,

दर्शनीयमानिनः,

दर्शनीयमानिना,

दर्शनीयमानिभ्याम्,

दर्शनीयमानिभिः,

दर्शनीयमानिने,

दर्शनीयमानिभ्याम्,

दर्शनीयमानिभ्यः,

दर्शनीयमानिनः,

दर्शनीयमानिभ्याम्,

दर्शनीयमानिभ्यः,

दर्शनीयमानिनः,

दर्शनीयमानिनोः,

दर्शनीयमानिनाम्,

दर्शनीयमानिनि,

दर्शनीयमानिनोः,

दर्शनीयमानिषु,

हे दर्शनीयमानिन्

हे दर्शनीयमानिनौ,

हे दर्शनीयमानिनः।