अयमपि दृश्यते। उखास्रत्। पर्णध्वत्। वाहभ्रट्।
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८१२- क्विप् च। क्विप् प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते से वचन-विपरिणाम करके दृश्यते आता है।
धातु मात्र से क्विप् प्रत्यय भी होता है।
ककार की लशक्वतद्धिते से, पकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। अनेक हल् वर्णों का विना अच् की सहायता के उच्चारण नहीं हो सकता है, अतः इकार को उच्चारण के लिए लगाया गया है। उसकी इत्संज्ञा करने की आवश्यकता ही नहीं है, स्वतः निवृत्त हो जाता है। अब बचा है वकार, उसका वेरपृक्तस्य से लोप हो जाता है। इस प्रकार से क्विप् प्रत्यय में से कुछ भी नहीं बचता। इसीको सर्वापहारलोप कहते हैं। अब प्रश्न आता है कि यदि सर्वापहार लोप ही करना है तो प्रत्यय का विधान क्यों किया? इसका उत्तर यह है कि प्रत्यय करने से सर्वापहार लोप हो जाने पर भी स्थानिवद्धावेन, प्रत्ययलक्षणेन वा प्रत्ययत्व रहता ही है। तात्पर्य यह कि प्रत्यय को मानकर होने वाले कार्य लोप होने पर भी हो सकते हैं। यह कृत्-प्रकरण का प्रत्यय है, अतः लोप हो जाने पर भी शब्द क्विप्-प्रत्ययान्त बना रहता है। प्रत्ययान्त होने से कृदन्त भी बना रहेगा। कृदन्त मानकर कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो सकेगी। एक और बात भी है कि कृत् के परे होने पर कार्य करने वाले
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ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् आदि सूत्रों की प्रवृत्ति भी हो सकेगी। इसी प्रकार कहीं पित् या कित् को मानकर के होने वाले कार्य भी हो सकते हैं।
उखास्रत्। उखायाः स्रंसते। बरतन से गिरने वाला। स्रसु अवस्रंसने धातु है। उखा डन्स्+स्रंस् इस पञ्चम्यन्त उपपद वाले स्रंस् धातु से क्विप् च से क्विप् प्रत्यय, सर्वापहार लोप हुआ। उपपदसमास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक्, प्रत्ययलक्षणेन क्विप् को परे मानकर अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति से स्रंस् में विद्यमान अनुस्वार के स्थानी नकार का लोप हुआ, स्रस् बचा। उखास्रस् बना हुआ है। समासत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञा है ही। अतः सु आया। अपृक्तसंज्ञा करके हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतीस्यपृक्तं हल् से लोप हुआ, उखास्रस् में अन्त्य सकार को वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः से दकार आदेश करके उखास्रद् बना। वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके उखास्रत्, उखास्रद् ये दो रूप सिद्ध होते हैं। आगे उखास्रसौ, उखास्रसः, उखास्रसम्, उखास्रसौ, उखास्रसः, उखास्रसा, उखास्रद्भ्याम्, उखास्रद्भिः, उखास्रद्भ्यः, उखास्रसाम्, उखास्रत्सु आदि।
पर्णध्वत्। पर्णात् ध्वंसते। पत्ते से गिरने वाला। ध्वंसु अवस्रंसने धातु है। पर्ण डन्स् इस पञ्चम्यन्त उपपद वाले ध्वंस् धातु से क्विप् च से क्विप् प्रत्यय, सर्वापहार लोप हुआ। उपपदसमास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक्, प्रत्ययलक्षणेन क्विप् को परे मानकर अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति से ध्वंस् में विद्यमान अनुस्वार के स्थानी नकार का लोप हुआ, ध्वंस् बचा। पर्णध्वंस् बना हुआ है। समासत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञा है ही। अतः सु आया। अपृक्तसंज्ञा करके हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतीस्यपृक्तं हल् से लोप हुआ, पर्णध्वंस् में अन्त्य सकार को वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः से दकार आदेश करके पर्णध्वंस् बना। वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके पर्णध्वंस्, पर्णध्वंस् ये दो रूप सिद्ध होते हैं। आगे पर्णध्वंसौ, पर्णध्वंसः, पर्णध्वंसम्, पर्णध्वंसौ, पर्णध्वंसः, पर्णध्वंसा, पर्णध्वंद्भ्याम्, पर्णध्वंद्भिः, पर्णध्वंद्भ्यः, पर्णध्वंसाम्, पर्णध्वंस्सु आदि।
वाहभ्रट्। वाहाद् भ्रंशते। घोडे से गिरने वाला। भ्रंशु अवस्रंसने धातु है। वाह डन्स्+भ्रंश् इस पञ्चम्यन्त उपपद वाले भ्रंश् धातु से क्विप् च से क्विप् प्रत्यय, सर्वापहार लोप हुआ। उपपदसमास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक्, प्रत्ययलक्षणेन क्विप् को परे मानकर अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति से भ्रंश् में विद्यमान अनुस्वार के स्थानी नकार का लोप हुआ, भ्रंश् बचा। वाहभ्रश् बना। समासत्वात् प्रातिपदिकसंज्ञा है ही। अतः सु आया। अपृक्तसंज्ञा करके हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतीस्यपृक्तं हल् से लोप हुआ, वाहभ्रश् में अन्त्य शकार को व्रश्चभ्रजसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षःः से षकार आदेश करके वाहभ्रष् बना। षकार को झलां जशोऽन्ते से जश्त्व करके डकार, उसको वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके टकार हो जाता है। इससे वाहभ्रट्, वाहभ्रड् ये दो रूप सिद्ध होते हैं। आगे वाहभ्रशौ, वाहभ्रशः, वाहभ्रशम्, वाहभ्रशौ, वाहभ्रशः, वाहभ्रशा, वाहभ्रड्भ्याम्, वाहभ्रड्भिः, वाहभ्रड्भ्यः, वाहभ्रशाम्, वाहभ्रट्सु, वाहभ्रट्सु आदि।
आगे क्विप् प्रत्ययान्त कुछ और उदाहरण दिये जा रहे हैं।
शास्त्रकृत्। शास्त्रं करोतीति। शास्त्र बनाने वाला। डुकृञ करणे। शास्त्र-पूर्वक कृ-धातु से क्विप् च से क्विप् प्रत्यय, ककार की लशक्वतद्धिते से, पकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा हो गई। अनेक हल् वर्णों का अच् की सहायता के विना उच्चारण नहीं हो सकता है, अतः इकार को उच्चारण के लिए लगाया गया है। उसकी इत्संज्ञा करने की आवश्यकता
ही नहीं है, अतः स्वतः निवृत्त हो गई। अब बचा है वकार, उसकी वेरपृक्तस्य से लोप हो गया। इस प्रकार से क्विप् प्रत्यय में से कुछ भी नहीं बचा अर्थात् सर्वापहार लोप हुआ। प्रत्ययलक्षण से क्विप् को परे मानकर ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् से ह्रस्व वर्ण कृ के ऋकार को तुक् का आगम हुआ। अनुबन्धलोप करके त् बचा। कित् होने के कारण ऋकार के अन्त में बैठा। शास्त्रकृत् बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, अनुबन्धलोप करके सकार बचा। उसकी अपृक्तसंज्ञा करके हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप हुआ, शास्त्रकृत् सिद्ध हुआ। अजादिविभक्ति के परे रहते केवल वर्णसम्मेलन होगा और हलादिविभक्ति के परे रहने पर तकार के स्थान पर झलां जशोऽन्ते से जश्त्व होकर दकार बन जाता है। सुप् के परे होने पर जश्त्व होकर के दकार होता है, फिर खरि च से चर्त्व होकर तकार ही बन जाता है।
इस तरह सातों विभक्तियों में इसके रूप निम्नानुसार बनते हैं-
विभक्ति
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा
शास्त्रकृत्
शास्त्रकृतौ
शास्त्रकृतः
द्वितीया
शास्त्रकृतम्
शास्त्रकृतौ
शास्त्रकृतः
तृतीया
शास्त्रकृता
शास्त्रकृद्ध्याम्
शास्त्रकृद्भिः
चतुर्थी
शास्त्रकृते
शास्त्रकृद्ध्याम्
शास्त्रकृद्ध्यः
पञ्चमी
शास्त्रकृतः
शास्त्रकृद्ध्याम्
शास्त्रकृद्ध्यः
षष्ठी
शास्त्रकृतः
शास्त्रकृतोः
शास्त्रकृताम्
सप्तमी
शास्त्रकृति
शास्त्रकृतोः
शास्त्रकृत्सु
सम्बोधन
हे शास्त्रकृत्!
हे शास्त्रकृतौ!
हे शास्त्रकृतः!
मधुलिट्। मधु लेढीति। शहद को चाटने वाला। लिह् आस्वादने। मधुपूर्वक लिह्-धातु से क्विप् प्रत्यय, उसका सर्वापहार, मधुलिह् की प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, उसका लोप, हो ढः से ढत्व करके लिट्-लिड् की तरह मधुलिट्-मधुलिड् बनेंगे। सातों विभक्तियों में लिह्-शब्द की तरह ही रूप बनते हैं। जैसे-
विभक्ति
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा
मधुलिट्-ड्
मधुलिहौ
मधुलिहः
द्वितीया
मधुलिहम्
मधुलिहौ
मधुलिहः
तृतीया
मधुलिहा
मधुलिड्ध्याम्
मधुलिड्भः
चतुर्थी
मधुलिहे
मधुलिड्ध्याम्
मधुलिड्भ्यः
पञ्चमी
मधुलिहः
मधुलिड्ध्याम्
मधुलिड्भ्यः
षष्ठी
मधुलिहः
मधुलिहोः
मधुलिहाम्
सप्तमी
मधुलिहि
मधुलिहोः
मधुलिट्सु, मधुलिट्सु
सम्बोधन
हे मधुलिट्-ड्!
हे मधुलिहौ!
हे मधुलिहः!
विषभुक्। विषं भुङ्क्ते। विष खाने वाला। भुज पालनाभ्यवहारयोः। विष-पूर्वक भुज-धातु से क्विप्, सर्वापहार लोप करके विषभुज् की प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, उसका लोप, चोः कुः से जकार को कुत्व करके गकार और उसको वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके ककार आदेश, चर्त्व न होने के पक्ष में गकार ही रहेगा। विषभुक्-विषभुग् दो रूप बनेंगे। अजादि विभक्ति के परे होने पर केवल वर्णसम्मेलन और हलादिविभक्ति के परे कुत्व करके
निम्नानुसार रूप बन जाते हैं-
विभक्ति
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा
विषभुक्-ग्
विषभुजौ
विषभुजः
द्वितीया
विषभुजम्
विषभुजौ
विषभुजः
तृतीया
विषभुजा
विषभुग्भ्याम्
विषभुग्भिः
चतुर्थी
विषभुजे
विषभुग्भ्याम्
विषभुग्भ्यः
पञ्चमी
विषभुजः
विषभुग्भ्याम्
विषभुग्भ्यः
षष्ठी
विषभुजः
विषभुजोः
विषभुजाम्
सप्तमी
विषभुजि
विषभुजोः
विषभुक्षु
सम्बोधन
हे विषभुक्-ग्!
हे विषभुजौ!
हे विषभुजः!