Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 801
आदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
विड्वनोरनुनासिकस्यात्
Aṣṭādhyāyī 6.4.41
Vṛtti Varadarājācārya

अनुनासिकस्याऽऽस्यात्। विजायत इति विजावा।

ओणृ अपनयने। अवावा। विच्। रुष रिष हिंसायाम्। रोट्। रेट्। सुगण्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८०१- विड्वनोरनुनासिकस्यात्। विट् च वन् च तयोरितरेतरद्वन्द्वो विड्वनौ, तयोः। विड्वनोः सप्तम्यन्तम्, अनुनासिकस्य षष्ठ्यन्तम्, आत् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। अङ्गस्य का अधिकार है।

विट् और वन् के परे होने पर अनुनासिक के स्थान पर आत् अर्थात् आकार आदेश होता है।

अङ्गस्य के अधिकार के कारण अनुनासिकस्य यह अङ्गस्य का विशेषण है, सो तदन्तविधि हाने से अनुनासिकान्त अङ्ग को यह आदेश प्राप्त होता है पर अलोऽन्त्यस्य की सहायता से अन्त्य वर्ण के स्थान पर हो जाता है। विट् प्रत्यय के परे आत्व के उदाहरण वैदिकी प्रक्रिया में देख सकते हैं, यहाँ वन् प्रत्यय के परे का उदाहरण देखें।

विजावा। विजायत इति- विशेष रूप से उत्पन्न होने वाला या पुत्र, पौत्र के रूप में स्वयं जन्मने वाला। यह भी वैदिक प्रयोग ही है। वि+जन् से अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते से वनिप् प्रत्यय हुआ। इकार और पकार की इत्संज्ञा, वन् बचा। विजन्+वन् बना। इट् प्राप्त, उसका नेड् वशि कृति से निषेध होने पर विजन्+वन् में विड्वनोरनुनासिकस्यात् से अनुनासिक वर्ण जन् के नकार के स्थान पर आकार आदेश होकर विज+आ+वन् बना। सवर्णदीर्घ करके विजावन् सिद्ध हुआ। इससे राजन् की तरह विजावा, विजावानौ, विजावानः, विजावानम्, विजावानौ, विजावनः, विजावना, विजावभ्याम्, विजावभिः, विजावने, विजावभ्यः आदि रूप बनते हैं।

अवावा। ओणति, अपनयतीति। हटाने वाला। ओणृ अपनयने धातु है। अनुबन्ध लोप के बाद ओणृ से अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते से वनिप् प्रत्यय हुआ। इकार और पकार की इत्संज्ञा, वन् बचा। ओणृ+वन् बना। इट् प्राप्त, उसका नेड् वशि कृति से निषेध होने पर ओणृ+वन् में विड्वनोरनुनासिकस्यात् से अनुनासिक वर्ण ओणृ के णकार के स्थान पर आकार आदेश होकर ओ+आ+वन् बना। ओ+आ में एचोऽयवायावः से अव् आदेश होकर अवावन् सिद्ध हुआ। इससे राजन् की तरह अवावा, अवावानौ, अवावानः, अवावानम्,

अवावानौ, अवानः, अवाना, अवावभ्याम्, अवावभिः, अवाने, अवावभ्यः आदि रूप बनते हैं।

रोट्। रेट्। ये दोनों विच् प्रत्यय के उदाहरण है। रोषति रेषति हिनस्तीति रोट्, रेट्। षकारान्त रुष् और रिष् धातु है। इनसे अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते से विच् प्रत्यय हुआ। चकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा, इकार उच्चारणार्थ है, वकार का वेरपृक्तस्य से लोप होकर सर्वापहार हो जाता है, अर्थात् कुछ भी नहीं बचता। पुनः प्रत्ययलक्षण से विच् प्रत्यय परे मान कर उसको आर्धधातुक समझ कर के रिष् और रुष् की उपधा इकार और उकार को पुगन्तलघूपधस्य च से गुण होकर रेष्, रोष् बन जाता है। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा हो जाने के बाद सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप, झलां जशोऽन्ते से षकार के स्थान पर जश्त्व करके डकार आदेश होकर रेड्, रोड् बना। वाऽवसाने से विकल्प से चर्त्व होने पर रेट्-रेड् और रोट्-रोड् ये रूप बनते हैं। आगे अजादि विभक्ति के परे केवल वर्णसम्मेलन और हलादि विभक्ति के पर जश्त्व करके रूप बनाये जाते हैं। रेट्-रेड्, रेषौ, रेषः, रेषम्, रेषौ, रेषः, रेषा, रेड्भ्याम्, रेड्भिः, रेषे, रेड्भ्यः आदि। इसी तरह से रोट्-रोड्, रोषौ, रोषः, रोषा, रोड्भ्याम् आदि।

सुगण्। सुष्ठु गणयति। अच्छा गिनने वाला। गण संख्याने धातु है। चुरादि का है, अतः स्वार्थ में णिच् होकर गणि बना है। सु पूर्वक गणि से अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते से विच् प्रत्यय होकर सर्वापहार लोप हुआ। णेरनिटि से इकार का लोप करके सुगण् बचा। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके रूप बनाइये- सुगण्, सुगणौ, सुगणः, सुगणम्, सुगणौ, सुगणः सुगणा, सुगणभ्याम्, सुगणिभः आदि।