Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 799
मनिनादिप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते
Aṣṭādhyāyī 3.2.75
Vṛtti Varadarājācārya

मनिन् क्वनिप् वनिप् विच् एते प्रत्ययाः धातोः स्युः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७९९- अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। अन्येभ्यः पञ्चम्यन्तम्, अपि अव्ययपदं, दृश्यन्ते क्रियापदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। आतो मनिन्क्वनिब्बनिपश्च से मनिन्क्वनिब्बनिपः और विजुपे छन्दसि

से विच् की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परच इनका अधिकार है ही। धातोः इस एकवचन को वचनविपरिणाम करके धातुभ्यः बनाया गया है।

अन्य धातुओं से परे भी मनिन्, क्वनिप्, वनिप् और विच् प्रत्यय देखे जाते हैं।

अष्टाध्यायी में इस सूत्र के पहले आतो मनिन्क्वनिप्बनिपश्च पढ़ा गया है। उससे आकारान्त धातुओं से वेद में मनिन्, क्वनिप् और वनिप् प्रत्ययों का विधान हुआ है। अब प्रकृत सूत्र से लोक में आकारान्त धातुओं के अतिरिक्त अन्य धातुओं से भी उक्त प्रत्ययों का विधान किया जा रहा है। सूत्र में दृश्यन्ते यह पद दिया है जिसका तात्पर्य है कि लोक में भी कहीं कहीं शिष्टों के ग्रन्थों में उक्त प्रत्यय देखे गये हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ-जहाँ शिष्टों ने उक्त प्रयोग किया है, उन्हें हम प्रकृत सूत्र से सिद्ध मान सकते हैं किन्तु अपने इच्छा से लोक में ऐसे प्रयोग नहीं करना चाहिए। उक्त चारों प्रत्ययों में अनुबन्धलोप होकर क्रमशः मन्, वन्, वन् शेष रहते हैं अर्थात् मनिन् में नकार अनुबन्ध है, इकार उच्चारणार्थ है। इसी तरह क्वनिप् में ककार और पकार इत्संज्ञक और इकार उच्चारणार्थ और वनिप् में पकार इत्संज्ञक और इकार उच्चारणार्थ है किन्तु विच् में सर्वापहारलोप अर्थात् सभी वर्णों का लोप हो जाता है। स्मरण रहे कि कृत् के अपृक्त वकार का वेरपृक्तस्य से लोप होता है। ८००- नेड्वशि कृति। न अव्ययपदम्, इट् प्रथमान्तं, वशि सप्तम्यन्तं, कृति सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्।