Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 798
खच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
प्रियवशे वदः खच्
Aṣṭādhyāyī 3.2.38
Vṛtti Varadarājācārya

प्रियंवदः। वशंवदः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

प्रिय या वश रूप कर्म के उपपद होने पर वद् धातु से खच् प्रत्यय होता है।

खकार और चकार इत्संज्ञक हैं, अ ही शेष रहता है। खित् होने के कारण मुम् का आगम होता है। शित् न होने के कारण शबादि नहीं होंगे।

प्रियंवदः। प्रियंवदतीति, प्रिय बोलने वाला, मधुरभाषी। यहाँ पर प्रिय+अम् के उपपद होने पर वद् धातु से खच् प्रत्यय, अनुबन्ध का लोप होने पर प्रिय+वद्+अ बना। वद्+अ=वद। कृद्योग षष्ठी होकर प्रिय+ङस्+वद में उपपदसमास, सुप् का लुक् करके प्रिय+वद बना। यकारोत्तरवर्ती अकार को अरुद्विषदजन्तस्य मुम् से मुम् का आगम अनुबन्ध लोप होने पर प्रिय+म्+वद में मकार के स्थान पर मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और उसको अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से परसवर्ण होकर प्रियंवद बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, स्वादिकार्य होकर प्रियंवदः सिद्ध हुआ।

वशंवदः। वशं वदतीति, अधीन में बोलता है, आज्ञाकारी है। वश यह कर्म उपपद है। शेष सभी प्रक्रिया प्रियंवदः की तरह है।