आदुत्तरस्यानव्ययस्य विसर्गस्य समासे नित्यं सादेशः करोत्यादिषु परेषु।
यशस्करी विद्या। श्राद्धकरः। वचनकरः॥
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७९५- अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य। कृ च कमिश्च कंसश्च कुम्भश्च पात्रञ्च कुशा च कर्णी च तेषामितरेतरद्वन्द्वः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्ण्यः, तेषु कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीषु। न अव्ययम् अनव्यव्यम्, नञ् तत्पुरुषः, तस्य अनव्ययस्य। अतः पञ्चम्यन्तं, कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीषु सप्तम्यन्तम्, अनव्ययस्य षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में विसर्जनीयस्य सः से विसर्जनीयस्य और सोऽपदादौ से सः तथा नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य इस सम्पूर्ण सूत्र की अनुवृत्ति आती है।
ह्रस्व अकार से परे उत्तरपद में स्थित न हो, ऐसे अव्ययभिन्न विसर्ग को समास में नित्य से सकार आदेश होता है, यदि कृ, कम्, कंस, कुम्भ, पात्र, कुशा और कर्णी ये परे हों तो।
यह विसर्गसन्धि का सूत्र है। इसके द्वारा विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश का विधान किया गया है। इसके विधान में पाँच नियम हैं-
१. जिसके स्थान पर सकार होना है, वह अव्ययभिन्न का विसर्ग हो।
२. वह विसर्ग ह्रस्व अकार से परे हो।
३. विसर्ग से परे कृ, कम् आदि में से कोई हो।
४. समस्तपद हो अर्थात् समास हो चुका हो।
५. उत्तरपद में स्थित न हो।
यशस्करी विद्या। यश देने वाली विद्या। यशः करोतीति-यशस्करी। यश के लिए विद्या हेतु है। अतः यशस्-पूर्वक कृ-धातु से कृओ हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु से हेतु अर्थ के द्योत्य होने पर ट-प्रत्यय, अनुबन्धलोप, अ बचा। अ की आर्थधातुकं शेषः से आर्थधातुकसंज्ञा होकर कृ में ऋकार को सार्वधातुकार्थधातुकयोः से रपर सहित गुण होकर यशस्+कर्+अ=यशस्+कर बना। कृत् के योग में कर्तृकर्मणोः कृति से षष्ठी विभक्ति हुई। यशस् डस् कर में उपपदमतिङ् से समास होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्तियों का लुक करने के बाद यशस्+कर में सकार को ससजुषो रुः से रुत्व करके खरवसानयोर्विसर्जनीयः से विसर्ग करने पर यशः+कर बना। यह विसर्ग ह्रस्व अकार से परे है, वह अव्यय वाला भी नहीं है, उससे कृ धातु परे है, समास भी हो गया है, और उत्तरपदस्थ भी नहीं है। अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य से विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश हुआ, यशस्कर बना। यह शब्द विद्या इस स्त्रीलिङ्ग शब्द का विशेषण है, अतः इसमें भी स्त्रीत्व की अपेक्षा है। फलतः टिङ्ढाणञ्जयसन्दध्नञ्मात्रच्तयप्ठवठञ्कञ्क्वरपः से डीप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, अकार का यस्येति च से लोप करके यशस्करी बना। प्रातिपदिक होने के कारण विभक्तिकार्य करके यशस्करी यह सिद्ध हुआ। यह हेतु का उदाहरण है।
श्राद्धकरः। श्राद्धं करोति तच्छीलम् अर्थात् श्राद्ध करना जिसका स्वभाव है। यहाँ पर श्राद्ध-पूर्वक कृ-धातु से ताच्छील्य अर्थ के द्योत्य होने पर कृओ हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु से ट करके गुण आदि करने पर श्राद्धकर बनता है। यहाँ पर विसर्ग के न होने के कारण सत्व करने का प्रसंग नहीं है। प्रातिपदिक होने के कारण विभक्तिकार्य करके पुँल्लिङ्ग में
श्राद्धकरः सिद्ध हो जाता है। इसी तरह तापकरः सूर्यः, दयाकरः सज्जनः आदि भी बनाये जा सकते हैं।
वचनकरः। वचनं करोतीति वचनों को मानने वाला, आज्ञाकारी। यहाँ पर वचन-पूर्वक कृ-धातु से आनुलोम्य अर्थ के द्योत्य होने पर कृओ हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु से ट करके गुण आदि करने पर वचनकर बनता है। प्रातिपदिक होने के कारण विभक्तिकार्य करके पुँल्लङ्ग में वचनकरः सिद्ध हो जाता है। इसी तरह आज्ञाकरः, वाक्यकरः आदि भी बनाये जा सकते हैं।