Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 794
ट्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
कृञो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु
Aṣṭādhyāyī 3.2.20
Vṛtti Varadarājācārya

एषु द्योत्येषु करोतेष्टः स्यात्॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७९४- कृओ हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु। हेतुश्च ताच्छील्यञ्च आनुलोम्यञ्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो हेतुताच्छील्यानुलोम्यानि, तेषु। कृञः पञ्चम्यन्तं, हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। चरेष्टः से टः की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है ही।

हेतु(कारण), ताच्छील्य(तत्स्वभाव) और आनुलोम्य(आज्ञाकारिता) ये अर्थ द्योत्य होने पर कृ-धातु से ट-प्रत्यय होता है।

टकार इत्संज्ञक है, अ शेष रहता है। उक्त तीनों अर्थों के उदाहरण अग्रिम सूत्र के बाद रखे गये हैं।